Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 12 / Mantra 3

117 Mantra
12/3
Devata- सविता देवता Rishi- श्यावाश्व ऋषिः Chhand- विराड् जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
विश्वा॑ रू॒पाणि॒ प्रति॑मुञ्चते क॒विः प्रासा॑वीद् भ॒द्रं द्वि॒पदे॒ चतु॑ष्पदे। वि नाक॑मख्यत् सवि॒ता वरे॒ण्योऽनु॑ प्र॒याण॑मु॒षसो॒ विरा॑जति॥३॥

विश्वा॑। रू॒पाणि॑। प्रति॑। मु॒ञ्च॒ते॒। क॒विः। प्र। अ॒सा॒वी॒त्। भ॒द्रम्। द्वि॒पद॒ इति॑ द्वि॒ऽपदे॑। चतु॑ष्पदे। चतुः॑पद॒ इति॑ चतुः॑पदे। वि। नाक॑म्। अ॒ख्य॒त्। स॒वि॒ता। वरे॑ण्यः। अनु॑। प्र॒याण॑म्। प्र॒यान॒मिति॑ प्र॒ऽयान॑म्। उ॒षसः॑। वि। रा॒ज॒ति॒ ॥३ ॥

Mantra without Swara
विश्वा रूपाणि प्रतिमुञ्चते कविः प्रासावीद्भद्रन्द्विपदे चतुष्पदे । वि नाकमख्यत्सविता वरेण्योनु प्रयाणमुषसो वि राजति ॥

विश्वा। रूपाणि। प्रति। मुञ्चते। कविः। प्र। असावीत्। भद्रम्। द्विपद इति द्विऽपदे। चतुष्पदे। चतुःपद इति चतुःपदे। वि। नाकम्। अख्यत्। सविता। वरेण्यः। अनु। प्रयाणम्। प्रयानमिति प्रऽयानम्। उषसः। वि। राजति॥३॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गत मन्त्रों के अनुसार माता-पिता व आचार्य से स्वास्थ्य, सदाचार व ज्ञानरूप धनों को प्राप्त करनेवाला यह व्यक्ति ‘श्यावाश्व’ बनता है [ श्यैङ् गतौ, अश्व = इन्द्रियाँ ]। गतिशील इन्द्रियोंवाला। यह सदा क्रियाशील बनता है। यह ( विश्वा रूपाणि ) = ज्ञान के सब शब्दों को अथवा छन्दों को [ रूप, word or verse ] ( प्रतिमुञ्चते ) = [ put on, arm oneself with ] धारण करता है अथवा उन छन्दों से अपने को सन्नद्ध करता है। इनसे सुसज्जित होकर वह अपने को पापों के आक्रमण से बचाता है। २. ( कविः ) = यह क्रान्तदर्शी होता है—सब वस्तुओं को ठीक स्वरूप में देखता है। ठीक रूप में देखने के कारण ही उनमें फँसता नहीं। ३. यह संसार में ( द्विपदे चतुष्पदे ) = मनुष्यों व अन्य प्राणियों के लिए ( भद्रम् ) = कल्याण ( प्रासावीत् ) = उत्पन्न करता है। यह सबका भला करने का ध्यान करता है। ४. परिणामतः यह ( नाकम् ) = स्वर्ग को ( वि अख्यत् ) = विशेषरूप से देखता है। ‘अस्तेयप्रतिष्ठायां सर्वरत्नोपस्थानम्’ के अनुसार इसे सब रत्न प्राप्त होते हैं। किसी हितरमणीय वस्तु की इसे कमी नहीं रहती। ५. ( सविता ) = यह सदा सबको हित की प्रेरणा देता है और उत्पादक होता है, अर्थात् निर्माण के ही कर्मों में लगा रहता है। ६. ( वरेण्यः ) = वरण करनेवालों में उत्तम होता है। धीर बनकर यह विवेकपूर्वक ‘श्रेय’ का ही वरण करता है। मन्दमतियों की भाँति ‘प्रेय’ का वरण करनेवाला नहीं होता। ७. ( उषसः प्रयाणम् अनु ) = उषः के आने के साथ ही ( विराजति ) = विशेषरूप से दीप्त होता है अथवा विशेषरूप से अपने नियमित कार्यक्रम में चल पड़ता है [ regulated ]। ८. इस प्रकार यह ‘श्यावाश्व’ नियमित गति करता हुआ ऊपर उठता है। इसके जीवन की विशेषता का प्रतिपादन अगले मन्त्र में है।
Essence
भावार्थ — श्यावाश्व १. छन्दों को अपना कवच बनाता है। २. क्रान्तदर्शी बनता है। ३. सबका भला करता है। ४. स्वर्ग में स्थित होता है। ५. सबको उत्तम प्रेरणा देता हुआ निर्माणात्मक कार्यों को करता है। ६. श्रेय का ही वरण करता है। ६. जीवन की क्रियाओं में बड़ा व्यवस्थित होता है।
Subject
श्यावाश्व का विश्वरूप प्रतिमोचन