Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 12 / Mantra 27

117 Mantra
12/27
Devata- अग्निर्देवता Rishi- वत्सप्रीर्ऋषिः Chhand- विराडार्षी त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
आ तं भ॑ज सौश्रव॒सेष्व॑ग्नऽउ॒क्थऽउ॑क्थ॒ऽआभ॑ज श॒स्यमा॑ने। प्रि॒यः सूर्ये॑ प्रि॒योऽअ॒ग्ना भ॑वा॒त्युज्जा॒तेन॑ भि॒नद॒दुज्जनि॑त्वैः॥२७॥

आ। तम्। भ॒ज॒। सौ॒श्र॒व॒सेषु॑। अ॒ग्ने॒। उ॒क्थउ॑क्थ॒ इत्यु॒क्थेऽउ॑क्थे। आ। भ॒ज॒। श॒स्यमा॑ने। प्रि॒यः। सूर्ये॑। प्रि॒यः। अ॒ग्ना। भ॒वा॒ति॒। उत्। जा॒तेन॑। भि॒नद॑त्। उत्। जनि॑त्वै॒रिति॒ जनि॑ऽत्वैः ॥२७ ॥

Mantra without Swara
आ तम्भज सौश्रवसेष्वग्नऽउक्थौक्थऽआभज शस्यमाने । प्रियः सूर्ये प्रियोऽअग्ना भवात्युज्जातेन भिनददुज्जनित्वैः ॥

आ। तम्। भज। सौश्रवसेषु। अग्ने। उक्थउक्थ इत्युक्थेऽउक्थे। आ। भज। शस्यमाने। प्रियः। सूर्ये। प्रियः। अग्ना। भवाति। उत्। जातेन। भिनदत्। उत्। जनित्वैरिति जनिऽत्वैः॥२७॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
पिछले मन्त्र की ही भावना को प्रकारान्तर से कहते हैं १. ( अग्ने ) = हे प्रगतिशील! तू ( तम् ) = उस ज्ञान देनेवाले आचार्य को ( सौश्रवसेषु ) = उत्तम यशोमय कर्मों में ( आभज ) = सेवित करनेवाला हो, अर्थात् आचार्य से शिक्षित होकर तू संसार में इस प्रकार उत्तम कर्म करनेवाला बन कि तेरे कर्मों से तेरे आचार्य का नाम उज्ज्वल हो। २. तू इस अपनी जीवन-यात्रा में ( उक्थे उक्थे शस्यमाने ) = जहाँ-जहाँ प्रभु-स्तवन हो रहा हो उस-उस स्थान पर ( आभज ) = प्रभु की उपासना करनेवाला बन, अर्थात् उन्हीं सत्सङ्गों में तू उपस्थित हो जहाँ प्रभु-स्तवन हो रहा हो। ३. इस प्रकार उत्तम कर्मों से आचार्य के नाम को उज्ज्वल करनेवाला तथा प्रभु- स्तवन में सम्मिलित होनेवाला व्यक्ति ( सूर्ये प्रियः भवति ) = सूर्य के समीप प्रिय होता है, अर्थात् इसके मस्तिष्करूप द्युलोक में सदा ज्ञान का सूर्य उदित रहता है। यह ( अग्नौ प्रियः भवति ) = अग्नि के समीप प्रिय होता है, अर्थात् इसके भौतिक शरीर में प्राणशक्ति की अग्नि सदा प्रज्वलित रहती है। इसके मस्तिष्क में ज्ञान का सूर्य उदित रहता है तो इसके पार्थिव शरीर की वेदि पर प्राणाङ्गिन सदा प्रज्वलित रहती है। ज्ञान चमकता हुआ होता है तो शरीर शक्ति की उष्णतावाला होता है। ४. अपने बाद भी यह ( जातेन ) = उत्पन्न पुत्र से ( उद्भिदत् ) = उदय व वृद्धि को प्राप्त होता है तथा ( जनित्वै ) = जनिष्यमाण [ आगे पैदा होनेवाले ] पौत्र आदि से भी यह अधिकाधिक उदय को प्राप्त होगा, अर्थात् इसका वंश और अधिक चमकनेवाला होगा।
Essence
भावार्थ — गुरु का आदर व प्रभु-भक्तिवाले पुरुष के जीवन में १. ज्ञान का सूर्य चमकता है २. इसकी जीवनी-शक्ति बनी रहती है तथा ३. इसका वंश उज्ज्वल होता है।
Subject
ज्ञान + स्वास्थ्य व उज्ज्वल वंश