Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 12 / Mantra 24

117 Mantra
12/24
Devata- अग्निर्देवता Rishi- वत्सप्रीर्ऋषिः Chhand- निचृदार्षी त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
उ॒शिक् पा॑व॒को अ॑र॒तिः सु॑मे॒धा मर्त्ये॑ष्व॒ग्निर॒मृतो॒ नि धा॑यि। इय॑र्त्ति धू॒मम॑रु॒षं भरि॑भ्र॒दुच्छु॒क्रेण॑ शो॒चिषा॒ द्यामिन॑क्षन्॥२४॥

उ॒शिक्। पा॒व॒कः। अ॒र॒तिः। सु॒मे॒धाः इति॑ सुऽमे॒धाः। मर्त्ये॑षु। अ॒ग्निः। अ॒मृतः॑। नि। धा॒यि॒। इय॑र्त्ति। धू॒मम्। अ॒रु॒षम्। भरि॑भ्रत्। उत्। शु॒क्रेण॑। शो॒चिषा॑। द्याम्। इन॑क्षन् ॥२४ ॥

Mantra without Swara
उशिक्पावकोऽअरतिः सुमेधा मर्त्येष्वग्निरमृतो निधायि । इयर्ति धूममरुषम्भरिभ्रदुच्छुक्रेण शोचिषा द्यामिनक्षन् ॥

उशिक्। पावकः। अरतिः। सुमेधाः इति सुऽमेधाः। मर्त्येषु। अग्निः। अमृतः। नि। धायि। इयर्त्ति। धूमम्। अरुषम्। भरिभ्रत्। उत्। शुक्रेण। शोचिषा। द्याम्। इनक्षन्॥२४॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. यह ( वत्सप्रीः ) = प्रभु का प्यारा ( उशिक् ) = [ वश् ] सबका भला चाहनेवाला होता है, किसी के अमङ्गल की भावना इसमें उत्पन्न नहीं होती। २. ( पावकः ) = यह सभी के जीवन को पवित्र बनाने का प्रयत्न करता है। ३. ( अरतिः ) = विषयों में रति व आसक्तिवाला नहीं होता। ४. ( सुमेधाः ) = उत्तम बुद्धिवाला अथवा उत्तम यज्ञोंवाला [ मेध = यज्ञ ] होता है ५. ( अग्निः ) = यह अग्रेणी—उन्नतिशील व्यक्ति ( मर्त्येषु ) = विषयों के पीछे मरनेवाले लोगों में ( अमृतः ) = विषयों के लिए अत्यन्त उत्सुक न होनेवाले के रूप में ( निधायि ) = रक्खा जाता है। प्रभु ही इस प्रकार के अमृत अग्नि को मर्त्यों में प्राप्त कराया करते हैं। इन्हें ही सामान्य जनता सुधारक के नाम से स्मरण करती है। ६. ( इयर्त्ति ) = यह व्यक्ति बड़ा गतिशील होता है। ७. ( धूमम् ) = वासनाओं को कम्पित करनेवाले ( अरुषम् ) = क्रोध से शून्य ज्ञान को ( भरिभ्रत् ) = निरन्तर धारण करता हुआ यह ( उत् ) = वासनाओं से ऊपर उठा हुआ ( शुक्रेण शोचिषा ) = प्रकाशमय अथवा क्रियायुक्त [ शुक् गतौ ] ज्ञान की दीप्ति से यह ( द्याम् ) = सारे द्युलोक को ( इनक्षन् ) = व्याप्त करता है, अर्थात् यह सर्वत्र ज्ञान का प्रकाश फैलाता है। वस्तुतः लोकहित का इससे अधिक उत्तम मार्ग नहीं है कि ज्ञान को फैलाकर उनके जीवन के मापक को ऊँचा कर दिया जाए। ज्ञान ही मनुष्य को वासनाओं से बचाकर इस योग्य बनाता है कि वह प्रभु के अधिक समीप पहुँच सके।
Essence
भावार्थ — हमें सभी के भले की कामना करनी चाहिए, अतः स्वयं विषयों से ऊपर उठकर ज्ञान का प्रसार करनेवाला होना चाहिए।
Subject
उशिक पावकः