Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 12 / Mantra 2

117 Mantra
12/2
Devata- अग्निर्देवता Rishi- कुत्स ऋषिः Chhand- आर्षी त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
नक्तो॒षासा॒ सम॑नसा॒ विरू॑पे धा॒पये॑ते॒ शिशु॒मेकं॑ꣳ समी॒ची। द्यावा॒क्षामा॑ रु॒क्मोऽअ॒न्तर्विभा॑ति दे॒वाऽअ॒ग्निं धा॑रयन् द्रविणो॒दाः॥२॥

नक्तो॒षासा॑। नक्तो॒षसेति॒ नक्तो॒षसा॑। सम॑न॒सेति॒ सऽम॑नसा। विरू॑पे॒ इति॒ विऽरू॑पे। धा॒पये॑ते॒ऽइति॑ धा॒पये॑ते। शिशु॑म्। एक॑म्। स॒मी॒ची इति॑ सम्ऽई॒ची। द्यावा॒क्षामा॑। रु॒क्मः। अ॒न्तः। वि। भा॒ति॒। दे॒वाः। अ॒ग्निम्। धा॒र॒य॒न्। द्र॒वि॒णो॒दा इति॑ द्रविणः॒ऽदाः ॥२ ॥

Mantra without Swara
नक्तोषासा समनसा विरूपे धापयेते शिशुमेकँ समीची । द्यावाक्षामा रुक्मोऽअन्तर्वि भाति देवाऽअग्निन्धारयन्द्रविणोदाः ॥

नक्तोषासा। नक्तोषसेति नक्तोषसा। समनसेति सऽमनसा। विरूपे इति विऽरूपे। धापयेतेऽइति धापयेते। शिशुम्। एकम्। समीची इति सम्ऽईची। द्यावाक्षामा। रुक्मः। अन्तः। वि। भाति। देवाः। अग्निम्। धारयन्। द्रविणोदा इति द्रविणःऽदाः॥२॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. पिछले मन्त्र में जीवन-निर्माण करनेवाले आचार्य का उल्लेख था। प्रस्तुत मन्त्र में ‘माता-पिता’ का प्रतिपादन है। ‘माता-पिता’ ( नक्तोषासा ) = रात्रि व दिन के समान हैं अथवा ( द्यावाक्षामा ) = द्युलोक व पृथिवीलोक के समान हैं [ द्यौरहं पृथिवी त्वम् ]। रात्रि उस समय की सूचक है जब सब घर पर रहते हैं और उषा या दिन उस समय का जब सब अपने कार्यों पर बाहर जाते हैं, अतः नक्त = रात्रि माता की सूचक है। माता ने घर पर रहकर घर की व्यवस्था का ध्यान करना है, ( उषा ) = दिन पिता का प्रतीक है, उसे घर के व्यय के लिए धनार्जन के हेतु से बाहर जाना है। पिता ने द्युलोक की भाँति ज्ञान-दीप्त होना है तो माता ने पृथिवी के समान क्षमावाला होना है। २. इस प्रकार ये दोनों ( विरूपे ) = भिन्न-भिन्न रूपवाले होते हुए भी ( समीची ) = [ सम् अञ्च् ] मिलकर गतिवाले हैं। ये दोनों मिलकर घर को बड़ा सुन्दर बनाने का प्रयत्न करते हैं। ( समनसा ) = दोनों के मन समान होते हैं। दोनों का उद्देश्य एक ही है—‘सन्तानों को उत्तम बनाना’। ये दोनों ( एकं शिशुम् ) = एक शिशु को ( धापयेते ) = दूध पिलाते हैं और इस प्रकार उसका पालन करते हैं। ३. यह उत्तम प्रकार से पालित हुआ सन्तान ( रुक्मः ) = स्वस्थ शरीरवाला होता हुआ चमकता है। ( द्यावाक्षामा अन्तः ) = यह माता और पिता के बीच में ( विभाति ) = विशेषरूप से दीप्त होता है और ( द्रविणोदाः ) = ज्ञान-धन को देनेवाले ( देवाः ) = विद्वान् आचार्य ( अग्निम् ) = इस प्रगतिशील बालक को ( धारयन् ) = अपने गर्भ में धारण करते हैं। इसे पूर्णरूप से सुरक्षित रखने का प्रयत्न करते हैं, जिससे यह संसार के वैषयिक जीवन से बचा रहे। इसके जीवन को पवित्र बनाते हुए ये इसे ज्ञान-धन से परिपूर्ण करने का प्रयत्न करते हैं। ५. ज्ञान-धन से पवित्र हुए ये ‘कुत्स’ बनते हैं, सब वासनाओं को ‘कुथ हिंसायाम्’ नष्ट करनेवाले होते हैं।
Essence
भावार्थ — माता-पिता व आचार्य बालक के जीवन को बड़ा सुन्दर बनाते हैं। माता-पिता इसे ‘स्वास्थ्य धन’ प्राप्त कराते हैं तो आचार्य ‘ज्ञान-धन’। इन धनों को प्राप्त करके यह सचमुच ‘कुत्स’ होता है—रोगों व पापों की हिंसा करनेवाला।
Subject
माता - पिता