Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 12 / Mantra 18

117 Mantra
12/18
Devata- अग्निर्देवता Rishi- वत्सप्रीर्ऋषिः Chhand- निचृदार्षी त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
दि॒वस्परि॑ प्रथ॒मं ज॑ज्ञेऽअ॒ग्निर॒स्मद् द्वि॒तीयं॒ परि॑ जा॒तवे॑दाः। तृ॒तीय॑म॒प्सु नृ॒मणा॒ऽअज॑स्र॒मिन्धा॑नऽएनं जर॒ते स्वा॒धीः॥१८॥

दि॒वः। परि॑। प्र॒थ॒मम्। ज॒ज्ञे॒। अ॒ग्निः। अ॒स्मत्। द्वि॒तीय॑म्। परि॑। जा॒तवे॑दा॒ इति॑ जा॒तऽवे॑दाः। तृ॒तीय॑म्। अ॒प्स्वित्य॒प्ऽसु। नृ॒मणा॑। नृ॒मना॒ इति॑ नृ॒ऽमनाः॑। अज॑स्रम्। इन्धा॑नः। ए॒न॒म्। ज॒र॒ते॒। स्वा॒धीरिति॑ सुऽआ॒धीः ॥१८ ॥

Mantra without Swara
दिवस्परि प्रथमञ्जज्ञे अग्निरस्माद्द्वितीयम्परि जातवेदाः । तृतीयमप्सु नृमणाऽअजस्रमिन्धानऽएनञ्जरते स्वाधीः ॥

दिवः। परि। प्रथमम्। जज्ञे। अग्निः। अस्मत्। द्वितीयम्। परि। जातवेदा इति जातऽवेदाः। तृतीयम्। अप्स्वित्यप्ऽसु। नृमणा। नृमना इति नृऽमनाः। अजस्रम्। इन्धानः। एनम्। जरते। स्वाधीरिति सुऽआधीः॥१८॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गत मन्त्र के अनुसार प्रभु का उपदेश सुनकर सबका कल्याण करता हुआ ‘त्रित’ प्रभु का प्रिय ‘वत्स’ बनता है और प्रभु को प्रीणित करने के कारण ‘प्रीः’ कहलाता है, अतः यह ‘वत्सप्रीः’ निम्न शब्दों में प्रभु की उपासना करता है— २. ( अग्निः ) = अग्रेणी प्रभु ( प्रथमम् ) = सबसे पहले ( दिवः ) = आकाश से ( परिजज्ञे ) = प्रादुर्भूत होते हैं। द्युलोक में प्रकट होनेवाले ज्योतिर्मय पिण्ड प्रभु की महिमा का प्रतिपादन करते हैं। अथर्ववेद के शब्दों में ‘अभ्यनूषत व्राः’ आकाश को आच्छादित करनेवाले ये तारे उस प्रभु की महिमा का स्तवन कर रहे हैं। ३. वह ( जातवेदाः ) = [ जाते = विद्यते ] प्रत्येक पदार्थ में वर्त्तमान प्रभु ( द्वितीयम् ) = दूसरे स्थान में ( अस्मत् ) = हमसे ( परि ) [ जज्ञे ] = प्रकट होते हैं। यह प्रभु से दिया गया हमारा शरीर अपनी विशिष्ट रचना से प्रभु की महिमा को प्रकट कर रहा है। ४. ( तृतीयम् ) = तीसरे स्थान में ( अप्सु ) = जलों में, समुद्रों में, उस प्रभु की महिमा दिखती है। जल जिस प्रकार बना, वह सब कितना अद्भुत है! ‘समुद्र का यह अनन्त पानी किस रसायनशाला में तैयार हुआ होगा! एवं, इन जलों में प्रभु की महिमा प्रकट हो रही है। ५. ( नृमणाः ) = [ नृषु मनो यस्य ] = ये प्रभु सदा नरों का हित करनेवाले हैं। जीवहित के उद्देश्य से ही तो संसार का निर्माण हुआ है। ६. ( एनम् ) = इस परमात्मा का ( स्वाधीः ) = उत्तम ध्यान करनेवाला भक्त ( अजस्रम् ) = निरन्तर ( इन्धानः ) = अपने को दीप्त करता हुआ ( जरते ) = उसका स्तवन करता है। प्रभु का स्तवन वही कर पाता है जो प्रतिदिन उस परमात्मा के योग का अभ्यास करता है। अभ्यास के द्वारा चित्तवृत्तिनिरोध करके ‘स्वाधीः’ = उत्तम ध्यानवाला बनता है।
Essence
भावार्थ — प्रभु की महिमा द्युलोक के तारों में, शरीर की रचना में तथा जलों व समुद्रों में सुव्यक्त है। उस प्रभु के ध्यान का प्रतिदिन अभ्यास करना आवश्यक है।
Subject
द्युलोक में, शरीर में, जलों में