Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 12 / Mantra 14

117 Mantra
12/14
Devata- जीवेश्वरौ देवते Rishi- त्रित ऋषिः Chhand- भुरिग् जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
ह॒ꣳसः शु॑चि॒षद् वसु॑रन्तरिक्ष॒सद्धोता॑ वेदि॒षदति॑थिर्दुरोण॒सत्। नृ॒ष॑द् व॑र॒सदृ॑त॒सद् व्यो॑म॒सद॒ब्जा गो॒जाऽऋ॑त॒जाऽअ॑द्रि॒जाऽऋ॒तं बृ॒हत्॥१४॥

ह॒ꣳसः। शु॒चि॒षत्। शु॒चि॒सदिति॑ शुचि॒ऽसत्। वसुः॑। अ॒न्त॒रि॒क्ष॒सदित्य॑न्तरिक्ष॒ऽसत्। होता॑। वे॒दि॒षत्। वे॒दि॒सदिति॑ वेदि॒ऽसत्। अति॑थिः। दु॒रो॒ण॒सदिति॑ दुरोण॒ऽसत्। नृ॒षत्। नृ॒सदिति॑ नृ॒ऽसत्। व॒र॒सदिति॑ वर॒ऽसत्। ऋ॒त॒सदित्यृ॑त॒ऽसत्। व्यो॒म॒सदिति॑ व्योम॒ऽसत्। अ॒ब्जा इत्य॒प्ऽजाः। गो॒जा इति॑ गो॒ऽजाः। ऋ॒त॒जा इत्यृ॑त॒ऽजाः। अ॒द्रि॒जा इत्य॑द्रि॒ऽजाः। ऋ॒तम्। बृ॒हत् ॥१४ ॥

Mantra without Swara
हँसः शुचिषद्वसुरन्तरिक्षसद्धोता वेदिषदतिथिर्दूरोणसत् । नृषद्वरसदृतसद्व्योमसदब्जा गोजाऽऋतजा अद्रिजा ऋतम्बृहत् ॥

हꣳसः। शुचिषत्। शुचिसदिति शुचिऽसत्। वसुः। अन्तरिक्षसदित्यन्तरिक्षऽसत्। होता। वेदिषत्। वेदिसदिति वेदिऽसत्। अतिथिः। दुरोणसदिति दुरोणऽसत्। नृषत्। नृसदिति नृऽसत्। वरसदिति वरऽसत्। ऋतसदित्यृतऽसत्। व्योमसदिति व्योमऽसत्। अब्जा इत्यप्ऽजाः। गोजा इति गोऽजाः। ऋतजा इत्यृतऽजाः। अद्रिजा इत्यद्रिऽजाः। ऋतम्। बृहत्॥१४॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. वे प्रभु ( हंसः ) = [ हन्ति पाप्मानं ] पाप को नष्ट करते हैं। ( शुचिषत् ) = पवित्र हृदय में निवास करनेवाले हैं। २. ( वसुः ) = सबको बसानेवाले हैं ( अन्तरिक्षसत् ) = मध्यममार्ग में चलनेवाले में प्रभु का निवास होता है। ३. ( होता ) = वे प्रभु सब-कुछ देनेवाले हैं। ( वेदिषत् ) = यज्ञमय जीवनवाले जीव में उस प्रभु की स्थिति है। ४. ( अतिथिः ) = वे प्रभु निरन्तर प्राप्त होनेवाले हैं, वे प्रभु ( दुरोणसत् ) = [ दुर्+ओण = अपनयन ] बुराइयों को दूर करनेवालों में आसीन होते हैं। ५. ( नृषत् ) = नरों में, आगे बढ़नेवालों में आसीन होते है। ६. ( वरसत् ) = वे प्रभु श्रेष्ठ व्यक्तियों में निवासवाले होते हैं। ७. ( ऋतसत् ) = जिनका जीवन नियमित [ regular ] है उनमें प्रभु का वास होता है। ८. ( व्योमसत् ) = [ वी ओम् ] गतिशीलता के कारण अपना रक्षण करनेवालों में वे प्रभु रहते हैं। ९. ( अब्जाः ) = जलों में उस प्रभु की महिमा प्रकट होती है। १०. ( गोजा ) = इस पृथिवी में वे प्रभु प्रकट होते हैं। मीलों फैले हुए रेगिस्तानों में उस प्रभु की महिमा दिखती ही है। ११. ( ऋतजा ) = वे प्रभु ऋत में, सूर्य-चन्द्रादि सभी पिण्डों की नियमित गति में दिखते हैं। १२. ( अद्रिजा ) = प्रभु की महिमा पर्वतों में प्रकट होती है— हिमाच्छादित पर्वत उसकी महिमा का गायन करते हैं। १३. ( ऋतम् ) = वे प्रभु स्वयं ऋत हैं, सत्यस्वरूप हैं। १४. ( बृहत् ) = सदा वर्धमान हैं अथवा ( ऋतं बृहत् ) = वे प्रभु पूर्ण सत्य हैं [ Absolute truth ]।
Essence
भावार्थ — ‘त्रित’ हंस—पापनाशक प्रभु का स्मरण करता है और अपने जीवन को पवित्र बनाता हुआ अन्ततः पूर्ण सत्य बनने का प्रयत्न करता है।
Subject
प्रभु व जीव