Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 12 / Mantra 111

117 Mantra
12/111
Devata- अग्निर्देवता Rishi- पावकाग्निर्ऋषिः Chhand- स्वराडार्षी पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
ऋ॒तावा॑नं महि॒षं वि॒श्वद॑र्शतम॒ग्निꣳ सु॒म्नाय॑ दधिरे पु॒रो जनाः॑। श्रुत्क॑र्णꣳ स॒प्रथ॑स्तमं त्वा गि॒रा दैव्यं॒ मानु॑षा यु॒गा॥१११॥

ऋ॒तावा॑नम्। ऋ॒तवा॑नमित्यृ॒तऽवा॑नम्। म॒हि॒षम्। वि॒श्वद॑र्शत॒मिति॑ वि॒श्वऽद॑र्शतम्। अ॒ग्निम्। सु॒म्नाय॑। द॒धि॒रे॒। पु॒रः। जनाः॑। श्रुत्क॑र्ण॒मिति॒ श्रुत्ऽक॑र्णम्। स॒प्रथ॑स्तम॒मिति॑ स॒प्रथः॑ऽतमम्। त्वा॒। गि॒रा। दैव्य॑म्। मानु॑षा। यु॒गा ॥१११ ॥

Mantra without Swara
ऋतावानम्महिषँविश्वदर्शतमग्निँ सुम्नाय दधिरे पुरो जनाः । श्रुत्कर्णँ सप्रथस्तमन्त्वा गिरा दैव्यम्मानुषा युगा ॥

ऋतावानम्। ऋतवानमित्यृतऽवानम्। महिषम्। विश्वदर्शतमिति विश्वऽदर्शतम्। अग्निम्। सुम्नाय। दधिरे। पुरः। जनाः। श्रुत्कर्णमिति श्रुत्ऽकर्णम्। सप्रथस्तममिति सप्रथःऽतमम्। त्वा। गिरा। दैव्यम्। मानुषा। युगा॥१११॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. पावकाग्नि प्रभु का आराधन करते हुए कहता है कि (जनाः) = अपना विकास करनेवाले लोग (सुम्नाय) = सुख प्राप्ति के लिए (त्वा) = आपको (पुर:) = अपने सामने (दधिरे) = स्थापित करते हैं, अर्थात् वे सदा आपका स्मरण करते हैं। आपके स्मरणपूर्वक ही सब काम करने के कारण उनके कार्य अपवित्र नहीं होते और उनका जीवन सुखी होता है। २. उन आपको वे धारण करते हैं, जो आप [क] (ऋतावानम्) = ऋतवाले हैं। प्रभु से होनेवाले सब कार्य ठीक समय पर व ठीक स्थान पर हो रहे हैं। वस्तुतः प्रभु के तीव्र तप से ही तो 'ऋत और सत्य' की उत्पत्ति हुई है। [ख] (महिषम्) = वे प्रभु महनीय, पूजनीय हैं, महान् हैं। । [ग] (विश्वदर्शतम्) = सबके दर्शनीय हैं अथवा सब विज्ञानों के द्रष्टा हैं। [घ] (अग्निम्) = वे अग्रेणी हैं-सबको आगे और आगे ले चलनेवाले हैं। [ङ] (श्रुत्कर्णम्) = [शृणोत्याह्वानम्] प्रार्थना को सुननेवाले हैं। [च] सप्रथस्तमम्- अतिशयेन विस्तारवाले हैं। वे प्रभु सर्वव्यापक हैं- कोई स्थान ऐसा नहीं जहाँ वे न हों। [छ] (दैव्यम्) = [ देव एव दैव्य:- स्वार्थे यः] वे प्रभु देव हैं अथवा देवों का हित करनेवाले हैं। ३. इस प्रभु को (मानुषा युगा) = मनुष्यों के युग्म अर्थात् दम्पती - पति-पत्नी (गिरा) = इस वेदवाणी के द्वारा, ज्ञान की वाणियों के द्वारा धारण करते हैं। घर में पति-पत्नी प्रभु के दिये हुए ज्ञान-वेद के स्वाध्याय द्वारा प्रभु को पानेवाले बनते हैं।
Essence
भावार्थ- प्रभु को आँख से ओझल न होने देनेवाले लोग पवित्र व सुखी जीवनवाले होते हैं। वेद के अध्ययन द्वारा पति-पत्नी प्रभु को पाते हैं।
Subject
प्रभु-प्राप्ति का साधन