Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 12 / Mantra 109

117 Mantra
12/109
Devata- अग्निर्देवता Rishi- पाकाग्निर्ऋषिः Chhand- निचृदार्षी पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
इ॒र॒ज्यन्न॑ग्ने प्रथयस्व ज॒न्तुभि॑र॒स्मे रायो॑ऽअमर्त्य। स द॑र्श॒तस्य॒ वपु॑षो॒ वि रा॑जसि पृ॒णक्षि॑ सान॒सिं क्रतु॑म्॥१०९॥

इ॒र॒ज्यन्। अ॒ग्ने॒। प्र॒थ॒य॒स्व॒। ज॒न्तुभि॒रिति॑ ज॒न्तुऽभिः॑। अ॒स्मेऽइत्य॒स्मे। रायः॑। अ॒म॒र्त्य॒। सः। द॒र्श॒तस्य॑। वपु॑षः। वि। रा॒ज॒सि॒। पृ॒णक्षि॑। सा॒न॒सिम्। क्रतु॑म् ॥१०९ ॥

Mantra without Swara
इरज्यन्नग्ने प्रथयस्व जन्तुभिरस्मे रायोऽअमर्त्य । स दर्शतस्य वपुषो वि राजसि पृणक्षि सानसिङ्क्रतुम् ॥

इरज्यन्। अग्ने। प्रथयस्व। जन्तुभिरिति जन्तुऽभिः। अस्मेऽइत्यस्मे। रायः। अमर्त्य। सः। दर्शतस्य। वपुषः। वि। राजसि। पृणक्षि। सानसिम्। क्रतुम्॥१०९॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. प्रभु 'पावकाग्नि' से कहते हैं कि [क] (इरज्यन्) = [ इरज्यति ऐश्वर्यकर्मा-नि० २।२१] ऐश्वर्यवाला होता हुआ, अर्थात् सब इन्द्रियों, मन व बुद्धि का ईश्वर बनता हुआ, इनकी दासता से ऊपर उठता हुआ, अतएव [ख] (अमर्त्य) = विषयों के पीछे न मरनेवाले और [ग] अग्ने प्रगतिशील जीव ! तू (अस्मे रायः) = हमारे इन धनों को (जन्तुभिः) = गौ इत्यादि पशुओं से (प्रथयस्व) = विस्तृत करनेवाला हो। गौ इत्यादि के पालन से मनुष्य अपने ऐश्वर्य की वृद्धि कर पाता है। गोशालास्थापन ' डेरीफार्म' स्वयं एक उत्तम व्यापार है। इन प्राप्त धनों को तू (जन्तुभिः) = प्राणियों के हेतु से (प्रथयस्व) = विस्तृत कर, अर्थात् प्राणियों के हित के लिए तू इनका विनियोग कर। यह अर्जित धन विषय-भोग जुटाने का साधन न हो जाए। २. यदि तू ऐसा कर पाता है तो (सः) = वह तू (दर्शतस्य वपुषः विराजसि) = दर्शनीय शरीर का राजा बनता है - तू बड़े उत्तम शरीरवाला होता है और ३. उस शरीर में तू (सानसिम्) = [षण सम्भक्तौ] सम्भजन - उपासन से युक्त (क्रतुम्) = प्रज्ञान व कर्म को (पृणक्षि) = [ पूरयसि ] पूरित करता है, अर्थात् अपने सुन्दर शरीर से तू उपासना करनेवाला होता है- तेरी यह उपासना प्रज्ञानपूर्वक किये जानेवाले कर्मों से होती है। वस्तुतः सौन्दर्य इसी बात पर तो निर्भर है कि वहाँ 'उपासना, प्रज्ञान व कर्म' तीनों का समन्वय हो पाया है।
Essence
भावार्थ- हम अपने ईश्वर हों। प्राणिहित के उद्देश्य से धनों का विनियोग करें। हमारे शरीर सुन्दर हों। उनमें 'उपासना, प्रज्ञान व कर्म' का समुच्चय हो।
Subject
सानसि ऋतु