Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 12 / Mantra 108

117 Mantra
12/108
Devata- अग्निर्देवता Rishi- पावकाग्निर्ऋषिः Chhand- निचृत् पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
ऊर्जो॑ नपाज्जातवेदः सुश॒स्तिभि॒र्मन्द॑स्व धी॒तिभि॑र्हि॒तः। त्वेऽइषः॒ संद॑धु॒र्भूरि॑वर्पसश्चि॒त्रोत॑यो वा॒मजा॑ताः॥१०८॥

ऊर्जः॑। न॒पा॒त्। जा॒त॒वे॒द॒ इति॑ जातऽवेदः। सु॒श॒स्तिभि॒रिति॑ सुश॒स्तिऽभिः॑। मन्द॑स्व। धी॒तिभि॒रिति॑ धी॒तिऽभिः॑। हि॒तः। त्वेऽइति॒ त्वे। इषः॑। सम्। द॒धुः॒। भूरि॑वर्पस॒ इति भूरि॑ऽवर्पसः। चि॒त्रोत॑य॒ इति॑ चि॒त्रऽऊ॑तयः। वा॒मजा॑ता॒ इति॑ वा॒मऽजा॑ताः ॥१०८ ॥

Mantra without Swara
ऊर्जा नपाज्जातवेदः सुशस्तिभिर्मन्दस्व धीतिभिर्हितः । त्वेऽइषः सन्दधुर्भूरिवर्पसश्चित्रोतयो वामजाताः ॥

ऊर्जः। नपात्। जातवेद इति जातऽवेदः। सुशस्तिभिरिति सुशस्तिऽभिः। मन्दस्व। धीतिभिरिति धीतिऽभिः। हितः। त्वेऽइति त्वे। इषः। सम्। दधुः। भूरिवर्पस इति भूरिऽवर्पसः। चित्रोतय इति चित्रऽऊतयः। वामजाता इति वामऽजाताः॥१०८॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. पावकाग्नि प्रभु का स्तवन करता हुआ कहता है कि (ऊर्जः नपात्) = हे प्रभो! आप मेरे बल व प्राणशक्ति को न गिरने देनेवाले हैं। आपकी कृपा से ही मेरी शक्ति स्थिर रहती है। आपका विस्मरण मुझे विषय-प्रवण व क्षीणशक्ति कर देता है। २. (जातवेद:) = हे प्रभो! सम्पूर्ण ज्ञान आपसे ही उत्पन्न होता है। मुझमें भी जो ज्ञान का लवलेश है, वह आपकी ही कृपा से है । ३. (सुशस्तिभिः) = उत्तम शंसनों के द्वारा-उत्तम स्तुति के द्वारा तथा (धीतिभिः) = ध्यान के द्वारा 'चित्तवृत्तिनिरोध' के द्वारा हितः = हृदय में स्थापित हुए हुए आप (मन्दस्व) = [मन्दयस्व] हमारे जीवनों को उल्लासमय कीजिए। आपकी कृपा ही मेरे सब कष्टों को दूर करके मेरे = अपनी जीवन में हर्ष को अंकुरित करनेवाली होगी। ४. हे प्रभो! जो भी व्यक्ति (त्वे) = आपमें (इषः) = इच्छाओं को (सन्दधुः) = धारण करते हैं, अर्थात् आपकी प्राप्ति ही जिनकी प्रबल कामना हो जाती है, वे [क] (भूरिवर्पसः) = [वर्पन् = form] बहुत आकृतियोंवाले होते हैं, अर्थात् वे अपने में बहुतों का समावेश करनेवाले- औरों से अपृथक् [अयुतोऽहम् ] होते हैं। यजुर्वेद के प्रथम मन्त्र के उपदेश के अनुसार 'बह्वीः' बहुत बनते हैं, एक नहीं रह जाते। स्वार्थ से ऊपर उठ परार्थ में स्थित होते हैं, इसीलिए [वर्पन् praise] बड़े यशवाले होते हैं- इनका जीवन उत्तम कर्मोंवाला होकर परार्थ व यज्ञ का साधक होकर यशस्वी बनता है। [ख] (चित्रोतयः) = ये अद्भुत रक्षणवाले होते हैं-वासनाओं से आश्चर्यजनकरूप में अपनी रक्षा करते हैं। अथवा चित्र [चिती संज्ञाने ] ज्ञान के द्वारा अपनी रक्षा करनेवाले बनते हैं तथा [ग] वामजातः = [ वामेषु प्रशस्तकर्मसु जाताः प्रसिद्धाः] उत्तम कर्मों में प्रसिद्ध होते हैं। इनके जीवन से सदा उत्तम ही कर्म होते हैं। इनके जीवन में सब वस्तुएँ सुन्दर-ही- सुन्दर होती हैं।
Essence
भावार्थ- हम प्रभु-स्तुति व ध्यान से अपने हृदयों में प्रभु की प्रतिष्ठा करें, तब १. हम अक्षीणशक्ति बनेंगे । २. हमारा ज्ञान बढ़ेगा। ३. हम एक-से बहुत हो जाएँगे अथवा प्रशंसात्मक कर्मों को ही करेंगे। ४. ज्ञान के द्वारा अपने को वासनाओं के आक्रमण से सुरक्षित कर पाएँगे तथा ५. हमारे जीवनों में सब वस्तुएँ सुन्दर-ही-सुन्दर होंगी।
Subject
पावकाग्नि का प्रभु-स्तवन