Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 12 / Mantra 1

117 Mantra
12/1
Devata- अग्निर्देवता Rishi- वत्सप्रीर्ऋषिः Chhand- भुरिक्पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
दृ॒शा॒नो रु॒क्मऽउ॒र्व्या व्य॑द्यौद् दु॒र्मर्ष॒मायुः॑ श्रि॒ये रु॑चा॒नः। अ॒ग्निर॒मृतो॑ऽअभव॒द् वयो॑भि॒र्यदे॑नं॒ द्यौरज॑नयत् सु॒रेताः॑॥१॥

दृ॒शा॒नः। रु॒क्मः। उ॒र्व्या। वि। अ॒द्यौ॒त्। दु॒र्मर्ष॒मिति॑ दुः॒ऽमर्ष॑म्। आयुः॑। श्रि॒ये। रु॒चा॒नः। अ॒ग्निः। अ॒मृतः॑। अ॒भ॒व॒त्। वयो॑भि॒रिति॒ वयः॑ऽभिः। यत्। ए॒न॒म्। द्यौः। अज॑नयत्। सु॒रेता॒ इति॑ सु॒ऽरेताः॑ ॥१ ॥

Mantra without Swara
दृशानो रुक्म उर्व्या व्यद्यौद्दुर्मर्षमायुः श्रिये रुचानः । अग्निरमृतोऽअभवद्वयोभिर्यदेनन्द्यौर्जनयत्सुरेताः ॥

दृशानः। रुक्मः। उर्व्या। वि। अद्यौत्। दुर्मर्षमिति दुःऽमर्षम्। आयुः। श्रिये। रुचानः। अग्निः। अमृतः। अभवत्। वयोभिरिति वयःऽभिः। यत्। एनम्। द्यौः। अजनयत्। सुरेता इति सुऽरेताः॥१॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. पिछले अध्याय की समाप्ति पर उत्तम सात्त्विक अन्न के सेवन का उपदेश है। ‘उस अन्न के सेवन से मनुष्य का जीवन किस प्रकार उत्तम बनता है’ इस बात के प्रतिपादन से यह अध्याय प्रारम्भ होता है। अन्न बीज है और माता-पिता व आचार्य भूमि व खाद आदि हैं। जीवन-निर्माण में बीज का भी स्थान है और भूमि का भी। अन्न का वर्णन पिछले मन्त्र में हुआ है, प्रस्तुत मन्त्र में आचार्य के लिए ‘द्यौः और सुरेताः’—इन शब्दों का प्रयोग हुआ है। आचार्य प्रकाशमय जीवनवाला तथा उत्तम रेतस्वाला हो। ऐसा ही आचार्य विद्यार्थी के जीवन का विकास करता है। २. यह विकसित जीवनवाला ( दृशानः ) = सब वस्तुओं को ठीक रूप में देखता है, अतः यह संसार में उलझता नहीं। ३. ( रुक्मः ) = विषयों में न उलझनेवाला यह [ रुच दीप्तौ ] चमकता है। इसका स्वास्थ्य ठीक रहता है। यह स्वास्थ्य की चमक से चमकता है। ४. ( उर्व्या ) = विशालता से ( व्यद्यौत् ) = यह दीप्त होता है। इसका हृदय विशाल होता है। ५. ( आयुः ) = इसका जीवन ( दुर्मर्षम् ) = विषयों से न कुचला जाने योग्य होता है। ६. ( श्रिये रुचानः ) = श्री के लिए यह रुचिवाला होता है। यह प्रत्येक कार्य को शोभा से करता है। ७. ( अग्निः ) = यह निरन्तर प्रगतिशील होता है। ८. ( अमृतः अभवत् ) = यह अमृत होता है, रोग इसकी मृत्यु का कारण नहीं बनते। ( यत् ) = क्योंकि ( एनम् ) = इसे ( सुरेताः ) = उत्तम रेतस्वाला, अर्थात् बह्मचारी ( द्यौः ) = ज्योतिर्मय मस्तिष्कवाला आचार्य ( वयोभिः ) = उत्तम अन्नों से ( अजनयत् ) = विकसित करता है। आचार्य इस बात का बड़ा ध्यान रखता है कि उसके विद्यार्थी का अन्न सात्त्विक हो, जिससे उसकी वृत्ति भी सात्त्विक ही बने। ९. इस प्रकार उत्तम जीवनवाला यह ‘वत्सप्री’ कहलाता है। इसका जीवन वेदप्रतिपादित बातों को क्रियान्वित किये हुए है और पवित्र कर्मों से वह अपने पिता प्रभु को प्रीणित करनेवाला होता है।
Essence
भावार्थ — हम उत्तम अन्न के सेवन से उत्तम जीवनवाले बनें।
Subject
द्यौः-सुरेताः