Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 11 / Mantra 9

83 Mantra
11/9
Devata- सविता देवता Rishi- प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- भुरिगतिशक्वरी Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
दे॒वस्य॑ त्वा सवि॒तुः प्र॑स॒वेऽश्विनो॑र्बा॒हुभ्यां॑ पू॒ष्णो हस्ता॑भ्याम्। आद॑दे गाय॒त्रेण॒ छन्द॑साङ्गिर॒स्वत् पृ॑थि॒व्याः स॒धस्था॑द॒ग्निं पु॑री॒ष्यमङ्गिर॒स्वदाभ॑र॒ त्रैष्टु॑भेन॒ छन्द॑साङ्गिर॒स्वत्॥९॥

दे॒वस्य॑। त्वा॒। स॒वि॒तुः। प्र॒स॒व᳕ इति॑ प्रऽस॒वे᳕। अ॒श्विनोः॑। बा॒हुभ्या॑म्। पू॒ष्णः। हस्ता॑भ्याम्। आ। द॒दे॒। गा॒य॒त्रेण॑। छन्द॑सा। अ॒ङ्गि॒र॒स्वत्। पृ॒थि॒व्याः। स॒धस्था॒दिति॑ स॒धऽस्था॑त्। अ॒ग्निम्। पु॒री॒ष्य᳖म्। अ॒ङ्गि॒र॒स्वत्। आ। भ॒र॒। त्रैष्टु॑भेन। त्रैस्तु॑भे॒नेति॒ त्रैऽस्तु॑भेन। छन्द॑सा। अ॒ङ्गि॒र॒स्वत् ॥९ ॥

Mantra without Swara
देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेश्विनोर्बाहुभ्याम्पूष्णो हस्ताभ्याम् । आददे गायत्रेण च्छन्दसाङ्गिरस्वत्पृथिव्याः सधस्थादग्निं पुरीष्यमङ्गिरस्वदाभर त्रैष्टुभेन छन्दसाङ्गिरस्वत् ॥

देवस्य। त्वा। सवितुः। प्रसव इति प्रऽसवे। अश्विनोः। बाहुभ्याम्। पूष्णः। हस्ताभ्याम्। आ। ददे। गायत्रेण। छन्दसा। अङ्गिरस्वत्। पृथिव्याः। सधस्थादिति सधऽस्थात्। अग्निम्। पुरीष्यम्। अङ्गिरस्वत्। आ। भर। त्रैष्टुभेन। त्रैस्तुभेनेति त्रैऽस्तुभेन। छन्दसा। अङ्गिरस्वत्॥९॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. पिछले मन्त्र के अनुसार अपना जीवन बनाने के लिए मैं ( त्वा ) = तुझे अर्थात् प्रत्येक पदार्थ को ( सवितुः देवस्य ) = सर्वोत्पादक दिव्य गुणों के पुञ्ज प्रभु की ( प्रसवे ) = अनुज्ञा में ( आददे ) = ग्रहण करता हूँ। न अतिमात्रा न अ-मात्रा में, अपितु यथोचित मात्रा में। 

२. ( अश्विनोः बाहुभ्याम् ) = प्राणापान के प्रयत्न से मैं तेरा ग्रहण करता हूँ, अर्थात् बिना श्रम के मैं किसी वस्तु को लेना पाप समझता हूँ। 

३. ( पूष्णो हस्ताभ्याम् ) = पूषा के हाथों से मैं तेरा ग्रहण करता हूँ, अर्थात् पोषण के दृष्टिकोण से ही मैं प्रत्येक वस्तु का स्वीकार करता हूँ। वस्तुओं के ग्रहण में ‘उपयोगिता’ न कि ‘स्वाद व सौन्दर्य’ मेरा मापक है, इसीलिए तो भोगों का शिकार नहीं होता। 

४. ( गायत्रेण छन्दसा ) = [ गयाः प्राणाः, त्र रक्षण ] प्राण-रक्षण की इच्छा से ( अङ्गिरस्वत् ) = अङ्गिरस् की भाँति मैं इस संसार में चलता हूँ। जो व्यक्ति इन भौतिक वस्तुओं की कामना ‘प्राणरक्षण की उपयोगिता’ के विचार से करता है वह ( ‘अङ्गिरस्’ ) = रसमय अङ्गोंवाला, अर्थात् सदा लोच और लचक से युक्त अङ्गोंवाला बना रहता है—उसका शरीर सूखे काठ की तरह नहीं हो जाता। प्रभु कहते हैं कि ( पृथिव्याः ) = इस पृथिवी के ( सधस्थात् ) = [ सहस्थानात् ] मिलकर बैठने के स्थान से ( पुरीष्यम् ) = [ यः सुखं पृणाति स पुरीषः तत्र साधुम्—द० ] जीवन को सुखी बनानेवाले ( अग्निम् ) = अग्नि को ( आभर ) = तू हव्यद्रव्यों से आभृत कर ( अङ्गिरस्वत् ) = अङ्गिरा की भाँति तू नियमितरूप से अग्निहोत्र करनेवाला बन। अग्निहोत्र करनेवाला व्यक्ति नीरोग बनकर बडे़ सुखी जीवनवाला होता है। उसके शरीर के सब अङ्ग नीरोगता के कारण रसमय बने रहते हैं। 

५. ( त्रैष्टुभेन छन्दसा ) = अब तू ‘काम, क्रोध व लोभ’ तीनों को रोकने की इच्छा से ( अङ्गिरस्वत् ) = अङ्गिरस की भाँति बनने का प्रयत्न कर। 

६. अङ्गिरा बनने के लिए ‘गायत्र’ व त्रैष्टुभ’ छन्द साधन रूप हैं। प्राणशक्ति की रक्षा की प्रबल कामना हममें हो तथा काम-क्रोध-लोभ को रोकने के लिए हमें प्रयत्नशाील होना चाहिए।
Essence
भावार्थ — मैं संसार में प्रभु की अनुज्ञा के अनुसार, यत्नपूर्वक, पोषण के दृष्टिकोण से वस्तुओं का ग्रहण करूँ। ‘प्राणशक्ति की रक्षा व काम-क्रोध-लोभ के वेग को रोकना’ मेरे जीवन का ध्येय हो। मैं ‘अङ्गिरस’ बनूँ। अङ्गिरस् की भाँति अग्निहोत्र करनेवाला बनूँ।
Subject
‘गायत्र-त्रैष्टुभ’ छन्द