Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 11 / Mantra 81

83 Mantra
11/81
Devata- पुरोहितयजमानौ देवते Rishi- नाभानेदिष्ठ ऋषिः Chhand- निचृदार्षी पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
सꣳशि॑तं मे॒ ब्रह्म॒ सꣳशि॑तं वी॒र्यं बल॑म्। सꣳशि॑तं क्ष॒त्रं जि॒ष्णु यस्या॒हमस्॑िम पु॒रोहि॑तः॥८१॥

सꣳशि॑त॒मिति॒ सम्ऽशि॑तम्। मे॒। ब्रह्म॑। सꣳशि॑त॒मिति॒ सम्ऽशि॑तम्। वी॒र्य᳕म्। बल॑म्। सꣳशि॑त॒मिति॒ सम्ऽशि॑तम्। क्ष॒त्रम्। जि॒ष्णु। यस्य॑। अ॒हम्। अस्मि॑। पु॒रोहि॑त॒ इति॑ पु॒रःऽहि॑तः ॥८१ ॥

Mantra without Swara
सँशितम्मे ब्रह्म सँशितं वीर्यम्बलम् । सँशितङ्क्षत्रञ्जिष्णु यस्याहमस्मि पुरोहितः ॥

सꣳशितमिति सम्ऽशितम्। मे। ब्रह्म। सꣳशितमिति सम्ऽशितम्। वीर्यम्। बलम्। सꣳशितमिति सम्ऽशितम्। क्षत्रम्। जिष्णु। यस्य। अहम्। अस्िम। पुरोहित इति पुरःऽहितः॥८१॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. पुरोहित राजा के लिए कामना करता है कि ( यस्य ) = जिसका ( अहम् ) = मैं ( पुरोहितः अस्मि ) = पुरोहित हूँ, उसका ( क्षत्रम् ) = बल ( संशितम् ) = तीव्र हो, प्रभावशाली हो। उसका बल ( जिष्णु ) = सदा विजयशील हो, अपना कार्य करने में सदा सफल हो। एक शाक्तिशाली राजा ही राष्ट्र की उत्तम व्यवस्था कर पाएगा, अतः उत्तम राष्ट्र-व्यवस्था के लिए राजा को सबल बनाना ही पुरोहित का मुख्य कार्य है। २. परन्तु वह स्वयं आदर्श [ पुरः+हित ] बनकर ही राजा के जीवन को उत्तम बना सकता है, अतः पुरोहित पहले स्वयं अपने लिए कामना करता है कि मे ( ब्रह्म ) = मेरा ज्ञान ( संशितम् ) = तीव्र हो, सदा अपने कार्य में समर्थ हो और ( मे ) = मेरी ( वीर्यम् ) = आन्तरिक रोगों की नाशकशक्ति ( संशितम् ) = तीव्र हो। परिणामतः मैं कभी रोगी न होऊँ और ( मे ) = मेरा ( बलम् ) = शत्रु-प्रतिरोधक बल ( संशितम् ) = तीव्र हो। निर्बल, रोगी व मूर्ख पुरोहित राजा को समझदार व सशक्त नहीं बना सकता।
Essence
भावार्थ — राष्ट्र में पुरोहित ज्ञानी, वीर्यवान् व सबल हों, जिससे वे राजा के लिए आदर्श [ model = पुरोहित ] बनें और राजा भी विजयशील शक्तिवाला बन पाये।
Subject
राजपुरोहित की कामना