Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 11 / Mantra 80

83 Mantra
11/80
Devata- अध्यापकोपदेशकौ देवते Rishi- नाभानेदिष्ठ ऋषिः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
योऽअ॒स्मभ्य॑मराती॒याद्यश्च॑ नो॒ द्वे॑षते॒ जनः॑। निन्दा॒द्योऽअ॒स्मान् धिप्सा॑च्च॒ सर्वं॒ तं भ॑स्म॒सा कु॑रु॥८०॥

यः। अ॒स्मभ्य॑म्। अ॒रा॒ती॒यात्। अ॒रा॒ति॒यादित्य॑राति॒ऽयात्। यः। च॒। नः॒। द्वेष॑ते। जनः॑। निन्दा॑त्। यः। अ॒स्मान्। धिप्सा॑त्। च॒। सर्व॑म्। तम्। भ॒स्म॒सा। कु॒रु॒ ॥८० ॥

Mantra without Swara
योऽअस्मभ्यमरातीयाद्यश्च नो द्वेषते जनः । निन्दाद्योऽअस्मान्धिप्साच्च सर्वन्तम्भस्मसा कुरु ॥

यः। अस्मभ्यम्। अरातीयात्। अरातियादित्यरातिऽयात्। यः। च। नः। द्वेषते। जनः। निन्दात्। यः। अस्मान्। धिप्सात्। च। सर्वम्। तम्। भस्मसा। कुरु॥८०॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
हे राजन्! १. ( यः ) = जो कोई भी ( अस्मभ्यम् ) = हमारे प्रति ( अरातीयात् ) = शत्रु की भाँति आचरण करे २. ( च यत् ) = और जो ( जनः ) = मनुष्य ( नः द्वेषते ) = हमसे द्वेष करता है—जिसे हमारे साथ नाममात्र भी प्रीति नहीं, ३. ( यः अस्मान् निन्दात् ) = जो हमारी निन्दा करे ४. ( च ) = और जो ( धिप्सात् च ) = हमें हिंसित करना चाहे या हमारे प्रति दम्भ से ( वर्ते तं सर्वम् ) = उन सबको ( मस्मसा कुरु ) = चूर्णीभूत कर दे—मसल दे। यहाँ आचार्य दयानन्द के भाष्य में ‘भस्मसा कुरु’ पाठ है। तब अर्थ होगा—‘उन सबको भस्म कर दे।’ ५. मन्त्र में यह संकेत है कि हे प्रभो! आपकी कृपा से हममें अरातिता, द्वेष, परनिन्दा व दम्भ की भावनाओं का अभाव हो। राष्ट्र वही उत्तम है जहाँ लोगों के मन इन दुर्भावनाओं से रहित हैं। राजा को शिक्षादि की ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए कि लोगों के मनों में ये भावनाएँ अंकुरित न हों।
Essence
भावार्थ — राजा अपनी प्रजा में परस्पर प्रेम की वृत्ति को जगाने का प्रयत्न करे।
Subject
मस्मसा-करण [ चूर्णीकरण ]