Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 11 / Mantra 8

83 Mantra
11/8
Devata- सविता देवता Rishi- प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- भुरिक् शक्वरी Swara- धैवतः
Mantra with Swara
इ॒मं नो॑ देव सवितर्य॒ज्ञं प्रण॑य देवा॒व्यꣳ सखि॒विद॑ꣳ सत्रा॒जितं॑ धन॒जित॑ꣳ स्व॒र्जित॑म्। ऋ॒चा स्तोम॒ꣳ सम॑र्धय गाय॒त्रेण॑ रथन्त॒रं बृ॒हद् गा॑य॒त्रव॑र्त्तनि॒ स्वाहा॑॥८॥

इ॒मम्। नः॒। दे॒व॒। स॒वि॒तः॒। य॒ज्ञम्। प्र। न॒य॒। दे॒वा॒व्य᳖मिति॑ देवऽअ॒व्य᳖म्। स॒खि॒विद॒मिति॑ सखि॒ऽविद॑म्। स॒त्रा॒जित॒मिति॑ सत्रा॒ऽजित॑म्। ध॒न॒जित॒मिति॑ धन॒ऽजित॑म्। स्व॒र्जित॒मिति॑ स्वः॒ऽजित॑म्। ऋ॒चा। स्तोम॑म्। सम्। अ॒र्ध॒य॒। गा॒य॒त्रेण॑। र॒थ॒न्त॒रमिति॑ रथम्ऽत॒रम्। बृ॒हत्। गा॒य॒त्रव॑र्त्त॒नीति॑ गाय॒त्रऽव॑र्त्तनि। स्वाहा॑ ॥८ ॥

Mantra without Swara
इमन्नो देव सवितर्यज्ञम्प्रणय देवाव्यँ सखिविदँ सत्राजितन्धनजितँ स्वर्जितम् । ऋचा स्तोमँ समर्धय गायत्रेण रथन्तरम्बृहद्गायत्रवर्तनि स्वाहा ॥

इमम्। नः। देव। सवितः। यज्ञम्। प्र। नय। देवाव्यमिति देवऽअव्यम्। सखिविदमिति सखिऽविदम्। सत्राजितमिति सत्राऽजितम्। धनजितमिति धनऽजितम्। स्वर्जितमिति स्वःऽजितम्। ऋचा। स्तोमम्। सम्। अर्धय। गायत्रेण। रथन्तरमिति रथम्ऽतरम्। बृहत्। गायत्रवर्त्तनीति गायत्रऽवर्त्तनि। स्वाहा॥८॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. हे ( देव सविता ) = प्रेरक, दिव्य गुणों के पुञ्ज प्रभो! ( नः ) = हमारे ( इमं यज्ञम् ) = इस यज्ञ को ( प्रणय ) = आगे बढ़ाइए। [ क ] ( देवाव्यम् ) = जो यज्ञ वायु आदि सब देवों को [ अवति = प्रीणयति ] प्रीणित करनेवाला है। [ ख ] ( सखिविदं ) = जो यज्ञ हमें अपने सखा [ परमात्मा ] को [ विद् लाभे ] प्राप्त करानेवाला है। [ ग ] ( सत्राजितम् ) = जो सत्य का विजय करनेवाला है। [ घ ] ( धनजितम् ) = धन को जितानेवाला है। [ ङ ] ( स्वर्जितम् ) = सुख व स्वर्ग को जितानेवाला है। 

२. एवं, हमारे जीवन में उस यज्ञ का स्थान हो जो यज्ञ इहलोक व परलोक—दोनों का कल्याण सिद्ध करता है। वायु आदि सब देवों का शोधक होने से यह ‘देवाव्य’ है, परमात्मा को प्राप्त करानेवाला है, जीवन को सत्यमय बनाता है। 

३. हे प्रभो! आप हमारे जीवनों में ( ऋचा ) = विज्ञान से ( स्तोमम् ) = स्तुति को ( समर्धय ) = समृद्ध कीजिए। ‘ज्ञानाद् ध्यानं विशिष्यते’ = ज्ञान हमारे ध्यान में विशेषता उत्पन्न करनेवाला हो। पदार्थों के विज्ञान से हमें कण-कण में उस प्रभु की महिमा दिखे। उदाहरणार्थ—उड़द वातनाशक हैं, उड़द की दाल वातकारक है। प्रभु ने उड़द के दो दलों में एक पतली सींक-सी रक्खी है जो वातनाशक है। दाल बनाने पर वह छिटकी जाकर अलग हो जाती है, अतः उसका वातनाशक तत्त्व नष्ट हो जाता है। 

४. ( गायत्रेण ) = [ गयाः प्राणाः तान् तत्रे ] प्राण-तत्त्व की रक्षा से ( रथन्तरम् ) = [ ब्रह्मवर्चसं वै रथन्तरं—तै० २।७।१।१ ]। हमारे ब्रह्मवर्चस् को ( समर्धय ) = बढ़ाइए। हमारा शरीर प्राणशक्ति-सम्पन्न हो तो हमारा मस्तिष्क ज्ञान की सम्पत्ति से परिपूर्ण हो। 

५. हमारा ( बृहत् ) = वृद्धि का कारणभूत स्तोम ( गायत्र-वर्त्तनि ) = प्राण के मार्गवाला हो, अर्थात् हम प्राणशक्ति-सम्पन्न हों और उस स्तुति के करनेवाले हों जो हमारी वृद्धि का कारण बनती है। 

६. ( स्वाहा ) = इस सबके लिए हम प्रभु के प्रति अपना अर्पण करनेवाले हों।
Essence
भावार्थ — हमारे जीवन में यज्ञ हो। विज्ञान के साथ स्तुति हो। प्राणशक्ति के साथ ब्रह्मवर्चस् हो। प्राणशक्ति की वृद्धि के साथ हमारे जीवन में वह स्तुति हो जो हमारी वृद्धि का कारण बने।
Subject
विज्ञान+स्तुति