Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 11 / Mantra 79

83 Mantra
11/79
Devata- सेनापतिर्देवता Rishi- नाभानेदिष्ठ ऋषिः Chhand- निचृदनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
ये जने॑षु म॒लिम्ल॑व स्ते॒नास॒स्तस्क॑रा॒ वने॑। ये कक्षे॑ष्वघा॒यव॒स्ताँस्ते॑ दधामि॒ जम्भ॑योः॥७९॥

ये। जने॑षु। म॒लिम्ल॑वः। स्ते॒नासः॑। तस्क॑राः। वने॑। ये। कक्षे॑षु। अ॒घा॒यवः॑। अ॒घ॒यव॒ इत्य॑घ॒ऽयवः॑। तान्। ते॒। द॒धा॒मि॒। जम्भ॑योः ॥७९ ॥

Mantra without Swara
ये जनेषु मलिम्लव स्तेनासस्तस्करा वने । ये कक्षेष्वघायवस्ताँस्ते दधामि जम्भयोः ॥

ये। जनेषु। मलिम्लवः। स्तेनासः। तस्कराः। वने। ये। कक्षेषु। अघायवः। अघयव इत्यघऽयवः। तान्। ते। दधामि। जम्भयोः॥७९॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. हे राजन्! ( तान् ) = उन्हें ( ते ) = तेरे ( जम्भयोः ) = तीव्र दाँतों में ( दधामि ) = स्थापित करता हूँ, अर्थात् आपके द्वारा उनका नाश करवाता हूँ, ( ये ) = जो ( जनेषु ) = लोगों के विषय में ( मलिम्लवः ) = मलिन आचरणवाले हैं, अर्थात् अपने आचरणों से सज्जनों के जीवनों में अशान्ति पैदा करते हैं। २. ( ये ) = जो ( स्तेनासः ) = चोर हैं, जो रात्रि के समय औरों के द्रव्यों को हरने का प्रयत्न करते हैं। ३. और जो ( वने ) = वन में रहनेवाले ( तस्कराः ) = लुटेरे हैं, ( ये ) = जो ( कक्षेषु ) = [ नदीपर्वतगहनेषु ] नदियों और पर्वतों के दुर्गम स्थानों में छिपे हुए ( अघायवः ) = दूसरों का अशुभ चाहनेवाले हैं, अर्थात् जो झाड़-झंकाड़ों में छिपे हुए आने-जानेवाले पथिकों की घात में बैठे होते हैं, उन्हें तेरे तीव्र दाँतों में स्थापित करता हूँ।
Essence
भावार्थ — राजा का कर्त्तव्य है कि वह मलिनाचरणवालों, चोरों, लुटेरों तथा परिपन्थियों को [ घात लगाकर बैठे लोगों को ] समाप्त कर दे।
Subject
जम्भाधान