Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 11 / Mantra 71

83 Mantra
11/71
Devata- अग्निर्देवता Rishi- विरूप ऋषिः Chhand- विराड्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
पर॑स्या॒ऽअधि॑ सं॒वतोऽव॑राँ२ऽअ॒भ्यात॑र। यत्रा॒हमस्मि॒ ताँ२ऽअ॑व॥७१॥

पर॑स्याः। अधि॑। सं॒वत॒ इति॑ स॒म्ऽवतः॑। अव॑रान्। अ॒भि। आ। त॒र॒। यत्र॑। अ॒हम्। अस्मि॑। तान्। अ॒व॒ ॥७१ ॥

Mantra without Swara
परस्याऽअधि सँवतोवराँऽअभ्यातर । यत्राहमस्मि ताँऽअव ॥

परस्याः। अधि। संवत इति सम्ऽवतः। अवरान्। अभि। आ। तर। यत्र। अहम्। अस्िम। तान्। अव॥७१॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रस्तुत मन्त्र का ऋषि ‘विरूप’ है, विशिष्ट रूपवाला। यह वधू से कहता है कि १. अब तू मुझसे ‘ऊढ़’ [ विवाहित ] हुई ( यत्र अहम् अस्मि ) = जहाँ मैं हूँ ( तान् ) = उन्हें [ मेरे घरवालों को ] ( अव ) = पालन करनेवाली बन। तू मेरे घर को ही अपना घर समझनेवाली हो। ३. ( संवतः ) = [ संवन्वते = संभजन्ते ] उत्तम प्रकार से पालन-पोषण करनेवाले ( अवरान् ) = अपने समीप के माता-पिता को व अन्य बन्धुओं को ( अभ्यातर ) = तैरकर अब तू इस पतिकुल की ओर आ जा। तेरा जीवन का पहला काल अपने बन्धुओं में ही बीता है, उन्होंने तुझे बड़े प्रेम से पाला है, परन्तु अब ( परस्याः अधि ) = अपनी दूसरी—अगली उत्कृष्ट जीवन-यात्रा का प्रकर्षेण ध्यान करती हुई तू उन सब सम्बन्धों को तैरकर इस पतिकुल में प्रवेश करनेवाली हो। ३. पितृगृह काल के दृष्टिकोण से ‘अवर’ है, पतिगृह ‘पर’। ‘पितृगृह’ कन्या के दृष्टिकोण से इसलिए भी अवर है कि उसे बनानेवाली कन्या की माता है, परन्तु पतिगृह का निर्माण इसे स्वयं करना है, अतः कन्या के लिए यही ‘पर’ है। ४. यदि कन्या पितृगृह को भूल पाती है तभी वह पतिगृह का निर्माण करनेवाली बनती है।
Essence
भावार्थ — कन्या के लिए पितृगृह ‘अवर’ व पतिगृह ‘पर’ होना चाहिए। वह पतिगृह का निर्माण करती हुई उस घर में सबका पालन करनेवाली बने।
Subject
वर वधू से