Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 11 / Mantra 66

83 Mantra
11/66
Devata- अग्न्यादयो मन्त्रोक्ता देवताः Rishi- विश्वामित्र ऋषिः Chhand- विराड्ब्राह्मी त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
आकू॑तिम॒ग्निं प्र॒युज॒ꣳ स्वाहा॒ मनो॑ मे॒धाम॒ग्निं प्र॒युज॒ꣳ स्वाहा॑ चि॒त्तं विज्ञा॑तम॒ग्निं प्र॒युज॒ꣳ स्वाहा॑ वा॒चो विधृ॑तिम॒ग्निं प्र॒युज॒ꣳ स्वाहा॑ प्र॒जाप॑तये॒ मन॑वे॒ स्वाहा॒ऽग्नये॑ वैश्वान॒राय॒ स्वाहा॑॥६६॥

आकू॑तिमित्याऽकू॑तिम्। अ॒ग्निम्। प्र॒युज॒मिति॑ प्र॒ऽयुज॑म्। स्वाहा॑। मनः॑। मे॒धाम्। अ॒ग्निम्। प्र॒युज॒मिति॑ प्र॒ऽयुज॑म्। स्वाहा॑। चि॒त्तम्। विज्ञा॑त॒मिति॒ विऽज्ञा॑तम्। अ॒ग्निम्। प्र॒युज॒मिति॑ प्र॒ऽयुज॑म्। स्वाहा॑। वा॒चः। विधृ॑ति॒मिति॒ विऽधृ॑तिम्। अ॒ग्निम्। प्र॒युज॒मिति॑ प्र॒ऽयुज॑म्। स्वाहा॑। प्र॒जाप॑तय॒ इति॑ प्र॒जाऽप॑तये। मन॑वे। स्वाहा॑। अ॒ग्नये। वै॒श्वा॒न॒राय॑। स्वाहा॑ ॥६६ ॥

Mantra without Swara
आकूतिमग्निम्प्रयुजँ स्वाहा मनो मेधामग्निम्प्रयुजँ स्वाहा चित्तँविज्ञातमग्निम्प्रयुजँ स्वाहा वाचो विधृतिमग्निम्प्रयुजँ स्वाहा प्रजापतये मनवे स्वाहाग्नये वैश्वानराय स्वाहा ॥

आकूतिमित्याऽकूतिम्। अग्निम्। प्रयुजमिति प्रऽयुजम्। स्वाहा। मनः। मेधाम्। अग्निम्। प्रयुजमिति प्रऽयुजम्। स्वाहा। चित्तम्। विज्ञातमिति विऽज्ञातम्। अग्निम्। प्रयुजमिति प्रऽयुजम्। स्वाहा। वाचः। विधृतिमिति विऽधृतिम्। अग्निम्। प्रयुजमिति प्रऽयुजम्। स्वाहा। प्रजापतय इति प्रजाऽपतये। मनवे। स्वाहा। अग्नये। वैश्वानराय। स्वाहा॥६६॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. विश्वामित्र निश्चय करता है कि ( आकूतिम् ) = [ बलं आत्मनो धर्मोः मनसः प्रेरणहेतुः—उ०, संकल्पः—म० ] संकल्प को, जो ( अग्निम् ) = अग्रगति का साधन है, ( प्रयुजम् ) = [ प्रयुङ्क्ते कर्मणि—उ० ] और मनुष्य को कर्म में प्रेरित करता है, उसे ( स्वाहा ) = [ सु+आह ] मैं प्रशंसित करता हूँ। २. ( मनः ) = अनुष्ठेय [ कर्त्तव्य ] के स्मरण-साधन मन को, ( मेधाम् ) = ऋत-ज्ञान की धारणशक्ति मेधा को, जो ( अग्निम् ) = उन्नति का साधन है और ( प्रयुजम् ) = प्रकृष्ट कर्मों में प्रेरित करनेवाली है, उसे ( स्वाहा ) = मैं प्रशंसित करता हूँ। ३. ( चित्तम् ) = स्मरण-साधन चित्त को ( विज्ञातम् ) = चित्त से सम्यक् अवगत कर्त्तव्य-ज्ञान को, जो ( अग्निम् ) = उन्नति का साधन है और ( प्रयुजम् ) = प्रकर्षेण कर्मों में प्रेरित करनेवाला है, उसे ( स्वाहा ) = मैं प्रशंसित करता हूँ। ४. ( वाचः विधृतिम् ) = वाणी के विशिष्ट धारण को, व्यर्थ न बोलने, अर्थात् मौन को, जो ( अग्निम् ) = उन्नति का साधन है ( प्रयुजम् ) = प्रकर्षेण कर्मों में लगानेवाला है, उसे ( स्वाहा ) = मैं प्रशंसित करता हूँ। ५. ( प्रजापतये मनवे ) = प्रजाओं के रक्षक विचारशील पुरुष के लिए ( स्वाहा ) = मैं प्रशंसात्मक शब्द कहता हूँ। ६. ( वैश्वानराय ) = सब मनुष्यों के हित करनेवाले ( अग्नये ) = अग्रेणी पुरुष के लिए ( स्वाहा ) = मैं प्रशंसा के शब्द कहता हूँ। ७. जिन बातों को हम अच्छा समझते हैं धीमे-धीमे उन्हीं के धारण का प्रयत्न करते हैं, अतः हम अपने जीवन में ‘संकल्प, मननशक्ति, मेधाचित्त, विज्ञात तथा वाचो विधारण’ मौन को धारण करें तथा अपने जीवन का लक्ष्य यह रक्खें कि हम विचारशील प्रजापति बनेंगे अथवा सभी का हित करनेवाले नेता बनेंगे [ मनु प्रजापति या वैश्वानर अग्नि ]।
Essence
भावार्थ — हमें ‘संकल्प, मनन, मेधाचित्त, विज्ञात व नपे-तुले शब्दों को बोलने की वृत्ति’ को धारण करना चाहिए, जिससे हम विचारशील प्रजापति बन सकें अथवा सबका हित करनेवाले अग्रणी बन पाएँ।
Subject
मनु प्रजापति व वैश्वानर अग्नि