Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 11 / Mantra 63

83 Mantra
11/63
Devata- सविता देवता Rishi- विश्वामित्र ऋषिः Chhand- भुरिग्बृहती बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
दे॒वस्त्वा॑ सवि॒तोद्व॑पतु सुपा॒णिः स्व॑ङ्गु॒रिः सु॑बा॒हुरु॒त शक्त्या॑। अव्य॑थमाना पृथि॒व्यामाशा॒ दिश॒ऽआपृ॑ण॥६३॥

दे॒वः। त्वा॒। स॒वि॒ता। उत्। व॒प॒तु॒। सु॒पा॒णिरिति॑ सुऽपा॒णिः। स्व॑ङ्गु॒रिरिति॑ सुऽअङ्गु॒रिः। सु॒बा॒हुरिति॑ सुऽबा॒हुः। उ॒त। शक्त्या॑। अव्य॑थमाना। पृ॒थि॒व्याम्। आशाः॑। दिशः॑। आ। पृ॒ण॒ ॥६३ ॥

Mantra without Swara
देवस्त्वा सवितोद्वपतु सुपाणिः स्वङ्गुरिः सुबाहुरुत शक्त्या । अव्यथमाना पृथिव्यामाशा दिश आ पृण ॥

देवः। त्वा। सविता। उत्। वपतु। सुपाणिरिति सुऽपाणिः। स्वङ्गुरिरिति सुऽअङ्गुरिः। सुबाहुरिति सुऽबाहुः। उत। शक्त्या। अव्यथमाना। पृथिव्याम्। आशाः। दिशः। आ। पृण॥६३॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. हे प्रभु-भक्त! ( त्वा ) = तुझे ( सविता देवः ) = सब दिव्य गुणों के बीज बोनेवाला, दैवी सम्पत्ति का स्वामी प्रभु ( उद्वपतु ) = उत्कृष्ट दिव्य बीजों से उप्त करे। तेरे हृदयक्षेत्र में प्रभु द्वारा उत्तम गुणों के बीज बोये जाएँ, परिणामतः २. तू उत्तम हाथोंवाला ( सुपाणिः ) = बन, तेरे हाथ सदा औरों की रक्षा के लिए विनियुक्त हों [ पा रक्षणे ]। वही हाथ पाणि है जो रक्षा में विनियुक्त होता है। ३. ( स्वंगुरिः ) = तू उत्तम अँगुलियोंवाला हो। [ अगि गतौ ] तेरी अंगुलियाँ सदा कार्यव्यापृत हों। इन्हें वेद में ‘दीधिति’ नाम भी दिया जाता है ‘धीयन्ते कर्मसु’ जो सदा उत्तम कर्मों में लगी रहती हैं। ४. ( सुबाहुः ) = तू उत्तम बाहुओंवाला हो [ बाहृ प्रयत्ने ]। तेरे प्रयत्न सदा उत्तम हों। ५. ( उत ) = और ( शक्त्या ) = शक्ति के कारण ( अव्यथमाना ) = कभी श्रान्त न होता हुआ तू ( पृथिव्याम् ) = इस पृथिवी पर अथवा ( दिशः ) = सब दिशाओं को ( आशाः आपृण ) = आशाओं से परिपूर्ण कर दे, अर्थात् तू सर्वत्र आशावाद का सञ्चार करनेवाला बन। हमारे उत्तम प्रयत्नों का परिणाम इतना तो होना ही चाहिए कि कहीं भी निराशा न हो। घर के सब व्यक्तियों का जीवन आशामय हो। ६. यहाँ मन्त्र में क्रम यह है कि [ क ] उत्तम गुणों का बीज बोया जाए [ ख ] हम सुपाणि, स्वंगुरिः व सुबाहु बनकर अश्रान्त होते हुए शक्तिपूर्वक कार्य करें जिससे सर्वत्र सुख-ही-सुख हो और चारों ओर आशावाद का सञ्चार हो। [ ग ] इस क्रम से यह बात स्पष्ट है कि क्रियाशीलता में ही गुणों का वास है।
Essence
भावार्थ — प्रभु-कृपा से हममें उत्तम गुणों के बीज ही अंकुरित हों और हम अनथकभाव से सदा कार्य करनेवाले हों।
Subject
उद्वपन