Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 11 / Mantra 53

83 Mantra
11/53
Devata- मित्रो देवता Rishi- सिन्धुद्वीप ऋषिः Chhand- उपरिष्टाद् बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
मि॒त्रः स॒ꣳसृज्य॑ पृथि॒वीं भूमिं॑ च॒ ज्योति॑षा स॒ह। सुजा॑तं जा॒तवे॑दसमय॒क्ष्माय॑ त्वा॒ सꣳसृ॑जामि प्र॒जाभ्यः॑॥५३॥

मि॒त्रः। स॒ꣳसृज्येति॑ स॒म्ऽसृज्य॑। पृ॒थि॒वीम्। भूमि॑म्। च॒। ज्योति॑षा। स॒ह। सुजा॑त॒मिति॒ सुऽजा॑तम्। जा॒तवे॑दस॒मिति॑ जा॒तऽवे॑दसम्। अ॒य॒क्ष्माय॑। त्वा॒। सम्। सृ॒जा॒मि॒। प्र॒जाभ्य॒ इति॑ प्र॒ऽजाभ्यः॑ ॥५३ ॥

Mantra without Swara
मित्रः सँसृज्य पृथिवीम्भूमिञ्च ज्योतिषा सह । सुजातञ्जातवेदसमयक्ष्माय त्वा सँ सृजामि प्रजाभ्यः ॥

मित्रः। सꣳसृज्येति सम्ऽसृज्य। पृथिवीम्। भूमिम्। च। ज्योतिषा। सह। सुजातमिति सुऽजातम्। जातवेदसमिति जातऽवेदसम्। अयक्ष्माय। त्वा। सम्। सृजामि। प्रजाभ्य इति प्रऽजाभ्यः॥५३॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. प्रभु सिन्धुद्वीप से कहते हैं कि तू ( पृथिवीम् ) = इस विस्तृत हृदयान्तरिक्ष [ प्रथ विस्तारे ] को ( भूमिं च ) = और जिसमें मनुष्य बना ही रहता है [ भवन्ति यस्यां सा भूमिः ], अर्थात् स्वस्थ शरीर को ( ज्योतिषा ) = मस्तिष्क में होनेवाली ज्ञान की ज्योति के ( सह ) = साथ ( संसृज्य ) = मिलाकर ( मित्रः ) = [ प्रमीतेः त्रायते ] मृत्यु व रोगों से अपने को बचानेवाला हुआ है। जब मनुष्य हृदय, शरीर व मस्तिष्क तीनों का समानरूप से ध्यान करता है, तभी वह पूर्ण स्वस्थ बन पाता है। 

२. ( सुजातम् ) = उत्तम प्रादुर्भाववाले, अर्थात् शरीर, मन व मस्तिष्क के समविकासवाले ( जातवेदसम् ) = पर्याप्त धनवाले को [ वेदस् = धन, ‘विद्’ लाभे ] ( अयक्ष्माय ) =  यक्ष्मादि रोगों का शिकार न होने देनेवाला करता हूँ। संसार में पूर्ण स्वास्थ्य के लिए उचित धन भी आवश्यक है, क्योंकि निर्धनता मनुष्य की चिन्ताओं का कारण बन, उसे क्षीणशक्ति कर देती है। 

३. ( त्वा ) = तुझ स्वस्थ व्यक्ति को ( प्रजाभ्यः ) = प्रजाओं के लिए ( संसृजामि ) = संसृष्ट करता हूँ, अर्थात् तेरा जीवन प्रजाओं के हित के लिए हो।
Essence
भावार्थ — १. मनुष्य विशाल हृदय, स्वस्थ शरीर व ज्योतिर्मय मस्तिष्कवाला बनकर नीरोग व निष्पाप बनता है। २. यह समविकासवाला व्यक्ति उचित धन प्राप्त करके पूर्ण नीरोग होता है।  ग़रीबी भी तो एक रोग ही है। ३. इस व्यक्ति को चाहिए कि अब लोकहित के कार्यों में संलग्न रहे।
Subject
सुजात