Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 11 / Mantra 50

83 Mantra
11/50
Devata- आपो देवताः Rishi- सिन्धुद्वीप ऋषिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
आपो॒ हि ष्ठा म॑यो॒भुव॒स्ता न॑ऽऊ॒र्जे द॑धातन। म॒हे रणा॑य॒ चक्ष॑से॥५०॥

आपः॑। हि। स्थ। म॒यो॒भुव॒ इति॑ मयः॒ऽभुवः॑। ताः। नः॒। ऊ॒र्जे। द॒धा॒त॒न॒। म॒हे। रणा॑य। चक्ष॑से ॥५० ॥

Mantra without Swara
आपो हि ष्ठा मयोभुवस्ता नऽऊर्जे दधातन । महे रणाय चक्षसे ॥

आपः। हि। स्थ। मयोभुव इति मयःऽभुवः। ताः। नः। ऊर्जे। दधातन। महे। रणाय। चक्षसे॥५०॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. ‘उत्कील’ गत मन्त्र का ऋषि था। उत्कील बनने के लिए यह जलों का ठीक प्रयोग करके जीवन को सौम्य बनाने का प्रयत्न करता है। इन स्यन्दमान जलों का ( द्वि ) = दो प्रकार से प्रयोग करने से यह ‘सिन्धु द्वीप’ कहलाता है [ सिन्धवः द्विर्गता आपो यस्मिन् ]। जलों का बाह्य व अन्तः समुचित प्रयोग करके यह जीवन को बहुत ही सुन्दर बनाता है। यह कहता है कि २. ( आपः ) = जल ( हि ) = निश्चय से ( मयोभुवः ) = कल्याण उत्पन्न करनेवाले ( ष्ठाः ) = हैं। ( ताः ) = वे जल ( नः ) = हमें ( ऊर्जे ) = बल और प्राणशक्ति में ( दधातन ) = धारण करें। ( महे रणाय चक्षसे ) = महान् रमणीय दर्शन, अर्थात् ब्रह्मदर्शन के लिए धारण करो, अर्थात् जलों के प्रयोग से जहाँ ऐहिक लाभ होता है और हमारे शरीर नीरोग व शक्ति-सम्पन्न बनते हैं, वहाँ इनका समुचित प्रयोग हमें आमुष्मिक लाभ भी प्राप्त कराता है और हम उस महान् रमणीय ब्रह्म का दर्शन करनेवाले होते हैं। 

३. अथवा ये जल हमें [ क ] ( महे ) = महत्त्व के लिए धारण करें, हमारे शरीर का उचित भार बढ़ानेवाले हों। [ ख ] ( रणाय ) = रमणीयता के लिए हों, स्वास्थ्य का सौन्दर्य देनेवाले हों अथवा [ रण शब्दे ] शब्दशक्ति को बढ़ानेवाले हों, तथा दोष को दूर करें। [ ग ] और ( चक्षसे ) = हमारी दृष्टिशक्ति को ठीक करनेवाले हों।
Essence
भावार्थ — जलों का ठीक प्रयोग हमारा कल्याण करनेवाला है। हमें बल व प्राणशक्ति देनेवाला है, भार को ठीक करता है, शब्दशक्ति को बढ़ाता है और दीर्घदृष्टि देता है।
Subject
मयोभुवः आपः