Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 11 / Mantra 49

83 Mantra
11/49
Devata- अग्निर्देवता Rishi- उत्कील ऋषिः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
वि पाज॑सा पृ॒थुना॒ शोशु॑चानो॒ बाध॑स्व द्वि॒षो र॒क्षसो॒ऽअमी॑वाः। सु॒शर्म॑णो बृह॒तः शर्म॑णि स्याम॒ग्नेर॒हꣳ सु॒हव॑स्य॒ प्रणी॑तौ॥४९॥

वि। पाज॑सा। पृ॒थुना॑। शोशु॑चानः। बाध॑स्व। द्वि॒षः। र॒क्षसः॑। अमी॑वाः। सु॒शर्म्म॑ण॒ इति॑ सु॒ऽशर्म॑णः। बृ॒ह॒तः। शर्म॑णि। स्या॒म्। अ॒ग्नेः। अ॒हम्। सु॒हव॒स्येति॑ सु॒ऽहव॑स्य। प्रणी॑तौ। प्रनी॑ता॒विति॒ प्रऽनी॑तौ ॥४९ ॥

Mantra without Swara
वि पाजसा पृथुना शोशुचानो बाधस्व द्विषो रक्षसोऽअमीवाः । सुशर्मणो बृहतः शर्मणि स्यामग्नेरहँ सुहवस्य प्रणीतौ ॥

वि। पाजसा। पृथुना। शोशुचानः। बाधस्व। द्विषः। रक्षसः। अमीवाः। सुशर्म्मण इति सुऽशर्मणः। बृहतः। शर्मणि। स्याम्। अग्नेः। अहम्। सुहवस्येति सुऽहवस्य। प्रणीतौ। प्रनीताविति प्रऽनीतौ॥४९॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. आचार्यकुल में परा व अपरा विद्या का ज्ञान प्राप्त करके जब विद्यार्थी संसार में आता है तब हीन आकर्षणवाला नहीं बनता। इसकी रुचि उत्कृष्ट बनी रहती है और ( उत् ) = उत्कृष्ट लक्ष्य के साथ ( कील ) = अपने को बाँधनेवाला यह ‘उत्कील’ कहलाता है। इस उत्कील से कहते हैं कि तू २. ( पृथुना ) = विस्तृत ( पाजसा ) = शक्ति से ( विशोशुचानः ) = विशेषरूप से ख़ूब चमकता हुआ हो। शक्ति की क्षीणता हीनाकर्षण, भोगवृत्ति में ही है। ‘उत्कील’ भोगों की ओर नहीं झुकता परिणामतः विशिष्ट शक्ति से देदीप्यमान होता है। 

३. तू अपने जीवन से ( द्विषः ) = द्वेष की भावनाओं को ( बाधस्व ) = रोककर दूर रखनेवाला हो। द्वेषाङ्गिन में तूने जलते नहीं रहना। ४. ( रक्षसः ) = राक्षसी वृत्तियों को, अपने रमण के लिए औरों के क्षय की वृत्ति को तू अपने से दूर रख। अपनी स्वार्थहानि करके भी तू परार्थ को सिद्ध करनेवाला बन। ५. ( अमीवाः ) = तू सब शारीरिक रोगों को अपने से दूर रख। शारीरिक रोग तुझे आक्रान्त न कर पाएँ। 

६. तेरी सदा एक ही आराधना हो कि उस ( बृहतः ) = [ बृहि वृद्धौ ] सब वृद्धियों के कारणभूत ( सुशर्मणः ) = उत्तम कल्याणमय प्रभु के ( शर्मणि ) = शरण में ( स्याम् ) = होऊँ। प्रभु ही मेरी शरण हों, प्रभु पर ही मुझे आस्था हो। मैं यथासम्भव ब्रह्मनिष्ठ बन पाऊँ। 

८. ( अहम् ) = मैं ( सुहवस्य ) = शोभन पुकारवाले, सदा उत्तम प्रेरणा देनेवाले ( अग्नेः ) = उस अग्रेणी प्रभु के ( प्रणीतौ ) =  प्रणयन में रहूँ, अर्थात् प्रभु जिधर ले-चलें उधर ही चलूँ। प्रभु नेता हों, मैं उनका अनुयायी होऊँ।
Essence
भावार्थ — उत्कृष्ट बन्धनवाला बनकर मैं शक्ति से चमकूँ। द्वेष, हिंसा व रोगों से दूर रहूँ। प्रभु की शरण में मेरा वास हो। प्रभु नेता हों मैं उनका अनुयायी बनूँ।
Subject
प्रभु के नेतृत्ववाला उत्कील