Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 11 / Mantra 48

83 Mantra
11/48
Devata- अग्निर्देवता Rishi- त्रित ऋषिः Chhand- भुरिगनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
ओष॑धयः॒ प्रति॑गृभ्णीत॒ पुष्प॑वतीः सुपिप्प॒लाः। अ॒यं वो॒ गर्भ॑ऽऋ॒त्वियः॑ प्र॒त्नꣳ स॒धस्थ॒मास॑दत्॥४८॥

ओष॑धयः। प्रति॑। गृ॒भ्णी॒त॒। पुष्प॑वती॒रिति॒ पुष्प॑ऽवतीः। सु॒पि॒प्प॒ला इति॑ सुऽपिप्प॒लाः। अ॒यम्। वः॒। गर्भः॑। ऋ॒त्वियः॑। प्र॒त्नम्। स॒धस्थ॒मिति॑ स॒धऽस्थ॑म्। आ। अ॒स॒द॒त् ॥४८ ॥

Mantra without Swara
ओषधयः प्रति गृभ्णीत पुष्पवतीः सुपिप्पलाः । अयँवो गर्भऽऋत्वियः प्रत्नँ सधस्थमासदत् ॥

ओषधयः। प्रति। गृभ्णीत। पुष्पवतीरिति पुष्पऽवतीः। सुपिप्पला इति सुऽपिप्पलाः। अयम्। वः। गर्भः। ऋत्वियः। प्रत्नम्। सधस्थमिति सधऽस्थम्। आ। असदत्॥४८॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. ( ओषधयः ) = हे दोषों का दहन करनेवाले आचार्यो! ( पुष्पवतीः ) = उत्तम पुष्पोंवाली ( सुपिप्पलाः ) = उत्तम फलोंवाली वाणियों को ( प्रतिगृभ्णीत ) = ग्रहण करो। ‘अर्थं वाचः पुष्पफलमाह, यज्ञदैवते पुष्पफले देवताध्यात्मे वा’ [ नि० १।१८ ]। [ क ] अर्थ ही वाणी का पुष्पफल है। इस प्रकार आचार्य अर्थसहित वाणी का ज्ञान रखता है। [ ख ] अथवा ‘यज्ञ’ वाणी के पुष्प हैं और देवता उसके फल हैं, अतः आचार्य वाणी में निर्दिष्ट यज्ञों को करनेवाला और देवताओं के ज्ञान को प्राप्त करानेवाला है। [ ग ] अथवा देवताओं का, अर्थात् प्राकृतिक शक्तियों का ज्ञान वाणी का पुष्प है और अध्यात्म व ब्रह्म-ज्ञान वाणी का फल है। एवं, आचार्य अपरा व परा दोनों ही ज्ञानों को प्राप्त करानेवाला होता है। वह सम्पूर्ण ज्ञान का पारङ्गत है। ब्रह्मचर्यसूक्त में इसी दृष्टि से आचार्य को ज्ञान का समुद्र कहा है। 

२. आचार्य अपने समीप आये हुए विद्यार्थी को गर्भ में धारण करता है और उसे प्रकृति, जीव व परमात्मा का ज्ञान न होने तक, अर्थात् तीन रात्रियों तक उदर में धारण करता है। आचार्यों से कहते हैं कि ( अयम् ) = यह ( वः ) = आपका ( गर्भः ) = गर्भ में वास करनेवाला ( ऋत्वियः ) = समय पर दुबारा जन्म लेनेवाला ब्रह्मचारी है। ‘तं जातं द्रष्टुं अभिसंयन्ति देवाः’ = इस उत्पन्न हुए विद्यार्थी को देखने के लिए बड़े-बडे़ विद्वान् आते हैं। 

३. अब यह विद्यार्थी आचार्यकुल से समावृत्त होकर घर में लौटता है और ( प्रत्नम् ) = अपने पुराने ( सधस्थम् ) = परिवार के व्यक्तियों के मिलकर ठहरने के स्थान में, अर्थात् पितृगृह में ( आसदत् ) = आसीन होता है। सारे अध्ययनकाल में २४, ४४ वा ४८ वर्ष इसका घर से किसी प्रकार का सम्बन्ध न रहा था, कुल ही उसका घर बन गया था। आज वह फिर पुराने घर में लौटता है।
Essence
भावार्थ — आचार्य परा व अपरा विद्या में निपुण हैं। विद्यार्थी आचार्य के समीप विद्या-ग्रहण के काल तक रहता है। समावृत्त होकर पुराने पितृगृह में लौटता है।
Subject
आचार्यकुल से विद्यार्थी का समावर्तन