Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 11 / Mantra 47

83 Mantra
11/47
Devata- अग्निर्देवता Rishi- त्रित ऋषिः Chhand- विराड् ब्राह्मी त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ऋ॒तꣳ स॒त्यमृ॒तꣳ स॒त्यम॒ग्निं पु॑री॒ष्यमङ्गिर॒स्वद्भ॑रामः। ओष॑धयः॒ प्रति॑मोदध्वम॒ग्निमे॒तꣳ शि॒वमा॒यन्त॑म॒भ्यत्र॑ यु॒ष्माः। व्यस्य॒न् विश्वा॒ऽअनि॑रा॒ऽअमी॑वा नि॒षीद॑न्नो॒ऽअप॑ दुर्म॒तिं ज॑हि॥४७॥

ऋ॒तम्। स॒त्यम्। ऋ॒तम्। स॒त्यम्। अ॒ग्निम्। पु॒री॒ष्य᳖म्। अ॒ङ्गि॒र॒स्वत्। भ॒रा॒मः॒। ओष॑धयः। प्रति॑। मो॒द॒ध्व॒म्। अ॒ग्निम्। ए॒तम्। शि॒वम्। आ॒यन्त॒मित्या॒ऽयन्त॑म्। अ॒भि। अत्र॑। यु॒ष्माः। व्यस्य॒न्निति॑ वि॒ऽअस्य॑न्। विश्वाः॑। अनि॑राः। अमी॑वाः। नि॒षीद॑न्। नि॒सीद॒न्निति॑ नि॒ऽसीद॑न्। नः॒। अप॑। दु॒र्म॒तिमिति॑ दुःऽम॒तिम्। ज॒हि॒ ॥४७ ॥

Mantra without Swara
ऋतँ सत्यमृतँ सत्यमम्ग्निम्पुरीष्यमङ्गिरस्वद्भरामः । ओषधयः प्रतिमोदध्वमग्निमेतँ शिवमायन्तमभ्यत्र युष्माः । व्यस्यन्विश्वाऽअनिराऽअमीवा निषीदन्नो अप दुर्मतिञ्जहि ॥

ऋतम्। सत्यम्। ऋतम्। सत्यम्। अग्निम्। पुरीष्यम्। अङ्गिरस्वत्। भरामः। ओषधयः। प्रति। मोदध्वम्। अग्निम्। एतम्। शिवम्। आयन्तमित्याऽयन्तम्। अभि। अत्र। युष्माः। व्यस्यन्निति विऽअस्यन्। विश्वाः। अनिराः। अमीवाः। निषीदन्। निसीदन्निति निऽसीदन्। नः। अप। दुर्मतिमिति दुःऽमतिम्। जहि॥४७॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गत मन्त्र के वर्णन के अनुसार प्रस्तुत मन्त्र में ‘समुद्रिय’ = प्रभु को धारण करनेवाले के जीवन का चित्रण करते हैं। इन व्यक्तियों का निश्चय होता है कि हम ( ऋतम् ) = जीवन की भौतिक क्रियाओं में ऋत [ right ] को, सामाजिक शक्तियों में ( सत्यम् ) = सत्य को और आध्यात्मिक जीवन में ( ऋतं सत्यं अग्निं पुरीष्यम् ) = ऋत और सत्य के उत्पत्ति स्थान, सब सुखों का पूरण करनेवाले अग्रेणी प्रभु को ( भरामः ) = धारण करते हैं और ( अङ्गिरस्वत् ) = अङ्गिरस् की भाँति बनते हैं। वस्तुतः खाना-पीना, सोना-जागना आदि शारीरिक क्रियाएँ बिलकुल ठीक समय व स्थान पर हों, अर्थात् ऋत [ right ] हों, व्यवहार में सत्य होने से मन बिलकुल परिशुद्ध हो तथा उस ऋत और सत्य के उद्गम स्थान, सुखों के पूरक [ पुरीष्य ] प्रभु का स्मरण हो तो मनुष्य का अङ्ग-प्रत्यङ्ग सबल, सशक्त व सरस बना रहता है। 

२. एक बालक के जीवन को इस प्रकार का बनाने में आचार्य का महत्त्वपूर्ण स्थान है। वे आचार्य ‘ओषधयाः’ हैं, दोषों का दहन [ उष दाहे ] करनेवाले हैं। इन आचार्यों से कहते हैं कि ( ओषधयः ) = हे दोषों का दहन करनेवाले आचार्यो! ( प्रतिमोदध्वम् ) = आप आनन्दित होओ। ( अत्र ) = यहाँ ( युष्माः अभि ) = आपकी ओर [ युष्मान् ] ( एतम् ) = इस ( शिवम् ) = मङ्गल स्वभाववाले, जिसके अन्दर माता-पिता ने मङ्गलमयी वृत्ति पैदा करने का प्रयत्न किया है, ( अग्निम् ) = जो आगे बढ़ने की वृत्तिवाला है उसको ( आयन्तम् ) = आते हुए देखकर आप प्रसन्न हों। तैत्तिरीय उपनिषद् में आचार्य प्रार्थना करता है कि ‘दमायन्तु मा ब्रह्मचारिणः स्वाहा क्षमायन्तु मा ब्रह्मचारिणः स्वाहा’ मुझे दम और क्षमवाले ब्रह्मचारी प्राप्त हों। इस प्रकार के विद्यार्थी का निर्माण आचार्य के लिए सुगम होता है। 

३. विद्यार्थी कहते हैं कि हे आचार्य! ( निषीदन् ) = डाँवाँडोल न होते हुए—अवस्थित रूपवाले आप ( विश्वाः ) = सब ( अनिरा ) [ अन्+इरा ] =  [ इरा = godess of speech ] ज्ञान की वाणियों की विरोधी ( अमीवा ) = बीमारियों को ( व्यस्यन् ) = हमसे दूर फेंकते हुए ( नः ) = हमसे ( दुर्मतिम् ) = दुर्मति को ( अप जहि ) = सुदूर विनष्ट कर दीजिए। 

४. एवं, यदि आचार्य अपना यह कर्त्तव्य समझेंगे कि ज्ञान की विघ्नभूत सब बीमारियों को दूर रखना है और सु-मति को उत्पन्न करना है तो आचार्य सचमुच ‘ओषधि’ होंगे, विद्यार्थियों के दोषों का दहन करेंगे और ऐसे स्नातकों के जीवन में ‘ऋत, सत्य व पुरीष्य अग्नि’ का वास होगा।
Essence
भावार्थ — हमारा जीवन भौतिक क्षेत्र में ऋतवाला, व्यावहारिक क्षेत्र में सत्यवाला तथा अध्यात्म में ‘पुरीष्य अग्निवाला’ हो।
Subject
ऋत-सत्य व पुरीष्य अग्नि