Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 11 / Mantra 43

83 Mantra
11/43
Devata- अग्निर्देवता Rishi- त्रित ऋषिः Chhand- विराट् त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
स जा॒तो गर्भो॑ऽअसि॒ रोद॑स्यो॒रग्ने॒ चारु॒र्विभृ॑त॒ऽओष॑धीषु। चि॒त्रः शिशुः॒ परि॒ तमा॑स्य॒क्तून् प्र मा॒तृभ्यो॒ऽअधि॒ कनि॑क्रदद् गाः॥४३॥

सः। जा॒तः। गर्भः॑। अ॒सि॒। रोद॑स्योः। अग्ने॑। चारुः॑। विभृ॑त॒ इति॒ विऽभृ॑तः। ओष॑धीषु। चि॒त्रः। शिशुः॑। परि॑। तमा॑सि। अ॒क्तून्। प्र। मा॒तृभ्य॑ इति॑ मा॒तृऽभ्यः॑। अधि॑। कनि॑क्रदत्। गाः॒ ॥४३ ॥

Mantra without Swara
स जातो गर्भाऽअसि रोदस्योरग्ने चारुर्विभृतऽओषधीषु । चित्रः शिशुः परि तमाँस्यक्तून्प्रमातृभ्योऽअधि कनिक्रदद्गाः ॥

सः। जातः। गर्भः। असि। रोदस्योः। अग्ने। चारुः। विभृत इति विऽभृतः। ओषधीषु। चित्रः। शिशुः। परि। तमासि। अक्तून्। प्र। मातृभ्य इति मातृऽभ्यः। अधि। कनिक्रदत्। गाः॥४३॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गत मन्त्रों का मेधावी [ कण्व ] अपने ज्ञान को बढ़ाकर ‘त्रित’ = काम, क्रोध व लोभ तीनों को तैरनेवाला बनता है। अथवा ‘ज्ञान, कर्म व भक्ति’ तीनों का विस्तार करता है [ त्रीन् तरति, त्रीन् तनोति इति त्रितः ] और इन शब्दों में प्रभु-स्मरण करता है कि— २. ( जातः ) = सदा से प्रसिद्ध [ प्रादुर्भूत ] ( सः ) = वह आप ( रोदस्योः ) = द्युलोक व पृथिवीलोक के, अर्थात् सारे ब्रह्माण्ड के ( गर्भः ) = गर्भ हो। आपने सारे ब्रह्माण्ड को अपने एक देश में धारण किया हुआ है [ पादोऽस्य विश्वा भूतानि ] ३. हे ( अग्ने ) = हमारी उन्नतियों के साधक प्रभो! ( चारुः ) = आप सुन्दर-ही-सुन्दर हो अथवा सारे संसार को गति देनेवाले हो [ चारयति = भ्र्रामयन् सर्वभूतानि ]। 

४. ( ओषधीषु ) = दोषों का दहन करनेवाली इन ओषधियों-वनस्पतियों के होने पर ( विभृतः ) = विशेषरूप से धारण किये गये हो, अर्थात् जब एक भक्त वानस्पतिक सात्त्विक भोजन से अपने अन्तःकरण की शुद्ध कर लेता है तब आप उसके हृदय में आविर्भूत होते हैं। भक्तों के पवित्र हृदय ही आपके निवास-स्थान होते हैं। 

५. उन हृदयों में स्थित हुए-हुए आप ( चित्रः ) = [ चित्-र ] संज्ञान देनेवाले हैं। 

६. ( शिशुः ) [ शो तनूकरणे ] = भक्त की बुद्धि को बड़ा सूक्ष्म बनाते हैं। 

७. ( तमांसि परि ) = अन्धकारों को दूर करते हो [ परि = वर्जन ] ( अक्तून् प्र ) = ज्ञान की रश्मियों को प्रकर्षेण प्राप्त कराते हो [ प्र = बढ़ाना ] ८. ( मातृभ्यः ) = प्रत्येक कार्य को माप-तोलकर करनेवाले के लिए अथवा ज्ञान का निर्माण करनेवालों के लिए ( गाः ) = वेदवाणियों को ( अधिकनिक्रदत् ) = आधिक्येन उच्चारण करते हो। बादल की गर्जना की भाँति हृदयस्थ प्रभु से वेदवाणियों का उच्चारण हो रहा है। हम यदि नहीं सुनते तो इसमें हमारा ही दुर्भाग्य है। हम ( माता ) = बड़ा माप-तोल कर चलनेवाले बनें, ज्ञान के निर्माण की प्रबल कामनावाले हों तब अवश्य इन वाणियों को सुनेंगे।
Essence
भावार्थ — सर्वव्यापक प्रभु के दर्शन के लिए निर्दोष अन्तःकरण चाहिए। वे प्रभु हृदयस्थ हो वेदवाणियों का उच्चारण कर रहे हैं। हमारी प्रत्येक क्रिया मपी-तुली हो तो हम अवश्य उन वाणियों को सुन पाएँगे।
Subject
त्रित का प्रभु-स्तवन