Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 11 / Mantra 42

83 Mantra
11/42
Devata- अग्निर्देवता Rishi- कण्व ऋषिः Chhand- उपरिष्टाद् बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
ऊ॒र्ध्वऽऊ॒ षु ण॑ऽऊ॒तये॒ तिष्ठा॑ दे॒वो न स॑वि॒ता। ऊ॒र्ध्वो वाज॑स्य॒ सनि॑ता॒ यद॒ञ्जिभि॑र्वा॒घद्भि॑र्वि॒ह्वया॑महे॥४२॥

ऊ॒र्ध्वः। ऊ॒ इत्यूँ॑। सु। नः॒। ऊ॒तये॑। तिष्ठ॑। दे॒वः। न। स॒वि॒ता। ऊ॒र्ध्वः। वाज॑स्य। सनि॑ता। यत्। अ॒ञ्जिभि॒रित्य॒ञ्जिऽभिः॑। वा॒घद्भि॒रिति॑ वा॒घत्ऽभिः॑। वि॒ह्वया॑महे॒ इति॑ वि॒ह्वया॑महे ॥४२ ॥

Mantra without Swara
ऊर्ध्वऽऊ षु णऽऊतये तिष्ठा देवो न सविता । ऊर्ध्वा वाजस्य सनिता यदञ्जिभिर्वाघद्भिर्विह्वयामहे ॥

ऊर्ध्वः। ऊ इत्यूँ। सु। नः। ऊतये। तिष्ठ। देवः। न। सविता। ऊर्ध्वः। वाजस्य। सनिता। यत्। अञ्जिभिरित्यञ्जिऽभिः। वाघद्भिरिति वाघत्ऽभिः। विह्वयामहे इति विह्वयामहे॥४२॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गत मन्त्र का ‘विश्वमना वैयश्व’ = नैत्यिक स्वाध्याय से ज्ञान को बढ़ाकर ‘कण्व’ मेधावी बना है। वह प्रभु से प्रार्थना करता है कि ( ऊ ) = निश्चय से आप ( नः ) = हमारी ( सुऊतये ) = उत्तम रक्षा के लिए ( ऊर्ध्वः तिष्ठ ) = ऊपर खडे़ हैं, अर्थात् तैयार-पर-तैयार हैं। 

२. ( सविता देवः न ) = ऊपर खड़े सूर्य की भाँति आप भी हमें निरन्तर प्रेरणा दे रहे हैं। हृदयस्थ प्रभु की प्रेरणा तो निरन्तर चलती ही है। 

३. ( वाजस्य ) = शक्ति व ज्ञानों के ( सनिता ) = संविभक्ता—देनेवाले आप ( ऊर्ध्वः ) = ऊपर खडे़ हैं, अर्थात् शक्ति व ज्ञान देने के लिए सदा उद्यत हैं। 

४. ( यत् ) = ज्योहीं हम ( अञ्जिभिः ) = [ अञ्ज गतौ ] क्रियाशील, कर्मठ ( वाघद्भिः ) = ज्ञान-निधि का वहन करनेवालों [ क्रियावानेष ब्रह्मविदां वरिष्ठः ] के साथ ( विह्वयामहे ) = विविध विषयों पर ज्ञान की विशिष्ट चर्चा करते हैं। हम विद्वानों के साथ ज्ञान-चर्चा करनेवाले बनें, वे प्रभु अवश्य हमारा रक्षण करेंगे—ऊर्ध्वस्थित सूर्यदेव के समान सदा उत्तम प्रेरणा प्राप्त कराएँगे और शक्ति व ज्ञान देंगे।
Essence
भावार्थ — हम विद्वानों के सम्पर्क से मेधावी बनकर प्रभु से यही आराधना करें कि १. प्रभो! हमारी रक्षा कीजिए। २. हमें उत्तम प्रेरणा प्राप्त कराइए। ३. शक्ति व ज्ञान दीजिए।
Subject
तैयार पर तैयार — सदा उद्यत