Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 11 / Mantra 35

83 Mantra
11/35
Devata- होता देवता Rishi- देवश्रवदेववातावृषी Chhand- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
सीद॑ होतः॒ स्वऽउ॑ लो॒के चि॑कि॒त्वान्त्सा॒दया॑ य॒ज्ञꣳ सु॑कृ॒तस्य॒ योनौ॑। दे॒वा॒वीर्दे॒वान् ह॒विषा॑ यजा॒स्यग्ने॑ बृ॒हद्यज॑माने॒ वयो॑ धाः॥३५॥

सीद॑। हो॒त॒रिति॑ होतः। स्वे। ऊँ॒ इत्यूँ॑। लो॒के। चि॒कि॒त्वान्। सा॒दय॑। य॒ज्ञम्। सु॒कृ॒तस्येति॑ सुऽकृ॒तस्य॑। योनौ॑। दे॒वा॒वीरिति॑ देवऽअ॒वीः। दे॒वान्। ह॒विषा॑। य॒जा॒सि॒। अग्ने॑। बृ॒हत्। यज॑माने। वयः॑। धाः॒ ॥३५ ॥

Mantra without Swara
सीद होतः स्वऽउ लोके चिकित्वान्सादया यज्ञँ सुकृतस्य योनौ । देवावीर्देवान्हविषा यजास्यग्ने बृहद्यजमाने वयो धाः ॥

सीद। होतरिति होतः। स्वे। ऊँ इत्यूँ। लोके। चिकित्वान्। सादय। यज्ञम्। सुकृतस्येति सुऽकृतस्य। योनौ। देवावीरिति देवऽअवीः। देवान्। हविषा। यजासि। अग्ने। बृहत्। यजमाने। वयः। धाः॥३५॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गत मन्त्र में उल्लेख था कि मार्ग पर चलनेवाला प्रभु-दर्शन करता है। प्रस्तुत मन्त्र में उस मार्ग का वर्णन करते हैं। 

२. हे ( होतः ) = [ हु दानादनयोः ] दानपूर्वक अदन करनेवाले! तू ( सीद ) = अपने इस शरीररूप घर में निषण्ण हो। तू अपने शरीर में ही ठहरनेवाला बन। तू स्वस्थ बन। 

३. उ और ( स्वः ) = अपने ही ( लोके ) = [ लोकृ दर्शने ] देखने में तू स्थित हो। तू अपना ही निरीक्षण करता हुआ, अपने दोषों को जानकर उन्हें दूर करनेवाला बन। तू ‘आत्म-निरीक्षण में स्थित हो’। 

४. ( चिकित्वान् ) = [ कित ज्ञाने ] तू ज्ञानी बन, समझदार बन। इस संसार में प्रत्येक कार्य को कुशलता से करनेवाला हो। 

५. इस ( सुकृतस्य ) = बहुत पुण्यों के ( योनौ ) = घर में, अर्थात् उस शरीर में जो ‘बहुपुण्यलब्धम्’ न जाने कितने पुण्यों से प्राप्त हुआ है और ‘धर्मैकहेतु’ = केवल धर्म के कार्यों के लिए दिया गया है, उस शरीर में ( यज्ञम् ) = [ यज्ञो वै श्रेष्ठतमं कर्म ] श्रेष्ठतम कर्मों को ( सादय ) = तू बिठा। यह पृथिवी तो ( देवयजनी ) = देवों के यज्ञ करने की भूमि है। यह हमारी छोटी पृथिवी, अर्थात् शरीर भी यज्ञों के लिए ही उद्दिष्ट है— ‘पुरुषो वाव यज्ञः’ = पुरुष तो है ही यज्ञ। 

६. ( देवावीः ) = [ अव, भागदुघे ] तू उत्तम कर्म कर, दिव्य गुणों के अंशों का अपने में दोहन करनेवाला हो। तू अपनी दैवी सम्पत्ति को बढ़ा। 

७. तू ( देवान् ) = दिव्य गुणों को ( हविषा ) = दानपूर्वक अदन से, त्यागवृत्ति से ही ( यजासि ) = अपने साथ सङ्गत करनेवाला होता है। त्यागपूर्वक उपभोग शरीर को स्वस्थ व नीरोग बनाता है तो मन को भी दिव्य गुणों से परिपूर्ण करता है। 

८. हे ( अग्ने ) = अपने सखा जीव की सब उन्नतियों के साधक प्रभो! ( यजमाने ) = इस यज्ञ के स्वभाववाले व्यक्ति में ( बृहद् वयः ) = इस वृद्धिशील जीवन को ( धाः ) = धारण कीजिए। यज्ञ के स्वभाववाला यह व्यक्ति उन्नति-पथ पर निरन्तर अग्रसर होता जाए। इसका जीवन वृद्धिशील हो। 

९. इस प्रकार दिव्य गुणों के कारण यश को प्राप्त करनेवाला यह व्यक्ति ‘देवश्रवस्’ कहलाता है, देवों के कारण यशवाला यह देवों— विद्वानों व सूर्यादि देवों से निरन्तर प्रेरणा प्राप्त करने के कारण ‘देववात’ है।
Essence
भावार्थ — मार्ग यह है — हम १. दानपूर्वक अदन [ भक्षण ] करनेवाले बनकर स्वस्थ बनें। २. आत्म-निरीक्षण करते हुए अपने ही दोषों को देखें। ३. समझदार बनें। ४. इस धर्मार्थ प्राप्त शरीर में निवास करते हुए यज्ञों को करनेवाले बनें। ५. दिव्य गुणों का अपने में दोहन करें। ६. त्यागवृत्ति से दिव्य गुणों को बढ़ाएँ। ७. वृद्धिशील जीवनवाले हों।
Subject
पाथ = मार्ग