Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 11 / Mantra 33

83 Mantra
11/33
Devata- अग्निर्देवता Rishi- भारद्वाज ऋषिः Chhand- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
तमु॑ त्वा द॒ध्यङ्ङृषिः॑ पु॒त्रऽई॑धे॒ऽअथ॑र्वणः। वृ॒त्र॒हणं॑ पुरन्द॒रम्॥३३॥

तम्। ऊ॒ इत्यूँ॑। त्वा॒। द॒ध्यङ्। ऋषिः॑। पु॒त्रः। ई॒धे॒। अथ॑र्वणः। वृ॒त्र॒हण॑म्। वृ॒त्र॒हन॒मिति॑ वृत्र॒ऽहन॑म्। पु॒र॒न्द॒रमिति॑ पुरम्ऽद॒रम् ॥३३ ॥

Mantra without Swara
तमु त्वा दध्यङ्ङृषिः पुत्र ईधेऽअथर्वणः । वृत्रहणम्पुरंदरम् ॥

तम्। ऊ इत्यूँ। त्वा। दध्यङ्। ऋषिः। पुत्रः। ईधे। अथर्वणः। वृत्रहणम्। वृत्रहनमिति वृत्रऽहनम्। पुरन्दरमिति पुरम्ऽदरम्॥३३॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. भरद्वाज ही कहते हैं कि ( तम् उ त्वा ) = निश्चय से उस आपको ( ईधे ) = अपने हृदय-कमल में [ पुष्कर में ] समिद्ध [ विकसित ] करता है। कौन? [ क ] ( दध्यङ् ) = निरन्तर ध्यान करनेवाला, दीर्घकाल तक, निरन्तर, आदरपूर्वक प्रभु से योग करता हुआ [ योगं युञ्जन् ], प्रतिदिन सन्ध्या करता हुआ। [ ख ] ( ऋषिः ) = तत्त्वद्रष्टा वस्तुओं की वास्तविकता का चिन्तन करनेवाला और परिणामतः उनमें न फँसनेवाला, [ ग ] ( पुत्रः ) = जो अपने को पवित्र करता है [ पुनाति ] और वासनाओं से अपने को बचाता है [ त्रायते ]। 

२. कहाँ समिद्ध करता है ? ( अथर्वणः ) =  डाँवाँडोल न होनेवाले मन में। प्रभु का दीपन हृदय में होता है, उस हृदय में जिसमें वासनाओं की लहरें नहीं उठती रहतीं। जो हृदय-समुद्र वासनाओं के तूप़ानों से क्षुब्ध नहीं है। क्षुब्ध हृदय-समुद्र में प्रभु-दर्शन नहीं होता। 

३. किसको समिद्ध करता है ? उस प्रभु को जो [ क ] ( वृत्रहणम् ) = प्रभु-ज्ञान की आवरणभूत वासना को नष्ट करनेवाले हैं। [ ख ] ( पुरन्दरम् ) =  शरीर, मन व बुद्धि में बनाये गये असुरों के अधिष्ठानों को नष्ट करनेवाले हैं।
Essence
भावार्थ — प्रभु-दर्शन उन्हें होता है जो ध्यानी, तत्त्वद्रष्टा, पवित्र व वासनाओं से अपना त्राण करनेवाले होते हैं। यह दर्शन वासनाओं से अनान्दोलित मन में होता है। दर्शन होने पर वासना विनष्ट हो जाती है, असुरों के किले भूमिसात् हो जाते हैं और हमारे ‘शरीर, मन व बुद्धि’ तीनों ही पवित्र हो जाते हैं।
Subject
दध्यङ् + ऋषिः + पुत्रः — इन्धन