Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 11 / Mantra 23

83 Mantra
11/23
Devata- प्रजापतिर्देवता Rishi- गृत्समद ऋषिः Chhand- आर्षी त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
आ त्वा॑ जिघर्मि॒ मन॑सा घृ॒तेन॑ प्रतिक्षि॒यन्तं॒ भुव॑नानि॒ विश्वा॑। पृ॒थुं ति॑र॒श्चा वय॑सा बृ॒हन्तं॒ व्यचि॑ष्ठ॒मन्नै॑ रभ॒सं दृशा॑नम्॥२३॥

आ। त्वा॒। जि॒घ॒र्मि॒। मन॑सा। घृ॒तेन॑। प्र॒ति॒क्षि॒यन्त॒मिति॑ प्रतिऽक्षि॒यन्त॑म्। भुव॑नानि। विश्वा॑। पृ॒थुम्। ति॒र॒श्चा। वय॑सा। बृ॒हन्त॑म्। व्यचि॑ष्ठम्। अन्नैः॑। र॒भ॒सम्। दृशा॑नम् ॥२३ ॥

Mantra without Swara
आ त्वा जिघर्मि मनसा घृतेन प्रतिक्षियन्तम्भुवनानि विश्वा । पृथुन्तिरश्चा वयसा बृहन्तँव्यचिष्ठमन्नै रभसन्दृशानम् ॥

आ। त्वा। जिघर्मि। मनसा। घृतेन। प्रतिक्षियन्तमिति प्रतिऽक्षियन्तम्। भुवनानि। विश्वा। पृथुम्। तिरश्चा। वयसा। बृहन्तम्। व्यचिष्ठम्। अन्नैः। रभसम्। दृशानम्॥२३॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गृत्समद प्रभु का स्तवन करते हुए कहता है कि—हे प्रभो! मैं तो ( आ ) = सब प्रकार से ( त्वा ) = आपको ही ( जिघर्मि ) = दीप्त करता हूँ। आपका ही प्रकाश देखने के लिए यत्नशील होता हूँ। 

२. इस आपके प्रकाश को मैं चक्षु आदि बाह्य इन्द्रियों से तो देख ही नहीं पाता। आपका वह प्रकाश इन इन्द्रियों का विषय नहीं, इसी से आप अतीन्द्रिय हो। मैं आपके प्रकाश को ( मनसा ) = मन से देखता हूँ, परन्तु कौन-से मन से? ( घृतेन ) = [ घृ क्षरणदीप्त्योः ] उस मन से जिसके सब मलों का क्षरण करके ज्ञान की दीप्ति से दीप्त करने का प्रयत्न किया गया है। 

३. मैं उस आपको देखता हूँ जो आप ( विश्वा भुवनानि ) = सब भुवनों में ( प्रतिक्षियन्तम् ) = निवास कर रहे हैं। प्रभु सर्वव्यापक हैं, परन्तु उन्हें देखना तो हमें अपने हृदयों में ही है। 

४. वे प्रभु ( तिरश्च पृथुम् ) = यह ब्रह्माण्ड एक सिरे से दूसरे सिरे तक जितना विस्तृत है, उससे अधिक विस्तृत हैं [ प्रथ विस्तारे ], अर्थात् प्रभु अधिक-से-अधिक विस्तृत देश से भी अविच्छिन्न नहीं हो सकते। यह सारा ब्रह्माण्ड तो उनके एक देश में ही है। 

५. ( वयसा ) = [ वय् गतौ ] निरन्तर गतिवाले इस काल से भी वे ( बृहन्तम् ) = बड़े हैं। काल भी उन्हें सीमित नहीं कर सकता। 

६. देश-काल से अनविच्छिन्न [ असीमित ] वे प्रभु ( व्यचिष्ठम् ) = अत्यन्त विस्तारवाले हैं [ व्यवस् = expanse, wastness ]। 

७. ( अन्नैः ) = विविध अन्नों से ( रभसम् ) = वे प्रभु हमें शक्ति [ strength ] देनेवाले हैं। अथवा अन्नों से वे हमें [ रभस = joy ] आनन्दित करनेवाले हैं। 

८. ( दृशानम् ) = वे प्रभु हमें तत्त्व का दर्शन करानेवाले हैं। अन्नों से वे हमारे शरीरों को सशक्त करते हैं तो तत्त्व-ज्ञान से हमारे मस्तिष्कों को दीप्त बनाते हैं।
Essence
भावार्थ — वे सर्वव्यापी प्रभु पवित्र मन से दिखते हैं। वे देश व काल से सीमित नहीं हैं। अत्यन्त विस्तारवाले वे प्रभु अन्नों से हमें शक्ति देते हैं और तत्त्व-दर्शन से मस्तिष्क को उज्ज्वल करते हैं।
Subject
देश-काल से अनविच्छिन्न प्रभु