Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 11 / Mantra 22

83 Mantra
11/22
Devata- द्रविणोदा देवता Rishi- मयोभूर्ऋषिः Chhand- निचृदार्षी त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
उद॑क्रमीद् द्रविणो॒दा वा॒ज्यर्वाकः॒ सुलो॒कꣳ सुकृ॑तं पृथि॒व्याम्। ततः॑ खनेम सु॒प्रती॑कम॒ग्निꣳ स्वो॒ रुहा॑णा॒ऽअधि॒ नाक॑मुत्त॒मम्॥२२॥

उत्। अ॒क्र॒मी॒त्। द्र॒वि॒णो॒दा इति॑ द्रविणः॒ऽदाः। वा॒जी। अर्वा॑। अक॒रित्यकः॑। सु। लो॒कम्। सुकृ॑त॒मिति॒ सुऽकृ॑तम्। पृ॒थि॒व्याम्। ततः॑। ख॒ने॒म॒। सु॒प्रती॑क॒मिति॑ सु॒ऽप्रती॑कम्। अ॒ग्निम्। स्व᳖ इति॑ स्वः᳖। रुहा॑णाः। अधि॑। नाक॑म्। उ॒त्त॒ममित्यु॑त्ऽत॒मम् ॥२२ ॥

Mantra without Swara
उदक्रमीद्द्रविणोदा वाज्यर्वाकः सु लोकँ सुकृतम्पृथिव्याम् ततः खनेम सुप्रतीकमग्निँ स्वो रुहाणाऽअधि नाकमुत्तमम् ॥

उत्। अक्रमीत्। द्रविणोदा इति द्रविणःऽदाः। वाजी। अर्वा। अकरित्यकः। सु। लोकम्। सुकृतमिति सुऽकृतम्। पृथिव्याम्। ततः। खनेम। सुप्रतीकमिति सुऽप्रतीकम्। अग्निम्। स्व इति स्वः। रुहाणाः। अधि। नाकम्। उत्तममित्युत्ऽतमम्॥२२॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. ( द्रविणोदाः ) = धन का दान करनेवाला ( वाजी ) = शक्तिशाली पुरुष ( उदक्रमीत् ) = विषयों से ऊपर उठता है। 

२. यह ( अर्वा ) = [ अर्व हिंसायाम् ] विषय-वासनाओं की हिंसा करनेवाला— भोगवृत्ति से ऊपर उठा हुआ व्यक्ति ( पृथिव्याम् ) = इस पृथिवी पर ( सुकृतम् ) = पुण्यों से निर्मित ( सुलोकम् ) = उत्तम लोक को ( अकः ) = निर्मित करता है, अर्थात् धन के त्याग द्वारा वैषयिकवृत्ति से ऊपर उठकर यह शक्तिशाली बनता है, पुण्य की प्रवृत्तिवाला होकर उत्तम लोक का निर्माण करता है। 

२. ( ततः ) = इस प्रकार उत्तम जीवन बनाकर हम ( उत्तमम् ) = अत्यन्त उत्कृष्ट ( नाकम् ) = [ न अकं यस्मिन् ] दुःख से शून्य ( स्वः ) = स्वर्गलोक में ( अधिरुहाणाः ) = आरोहण करते हुए ( सुप्रतीकम् ) = शोभन ( मुखवाले ) = अत्यन्त तेजस्वी ( अग्निम् ) = अग्रेणी प्रभु को ( खनेम ) = खोजने में समर्थ हों। जब हम जीवन को उत्तम बनाते हैं तब हमारा जीवन सुखमय होता है, अभ्युदय-सम्पन्न होता है तथा हम प्रभु को प्राप्त करने में समर्थ होते हैं—निःश्रेयस को सिद्ध कर पाते है। 

३. एवं, ‘मयोभूः’ का जीवन सामान्यरूप से ‘विषय-वासनाओं में न फँसकर प्रभु की खोजनेवाला’ है। वस्तुतः ‘ऐहिक जीवन का सुख’ विषय-वासनाओं में न फँसने में ही है और ‘आमुष्मिक कल्याण’ प्रभु के अन्वेषण में है। यह ‘मयोभूः’ इस प्रभु का स्तवन करता है, अतएव ‘गृत्स’ [ गृणाति इति ] कहलाता है और सदा प्रसन्न रहता है [ माद्यति ] अतः ‘मद’ कहलाता है। यह ‘मयोभूः’ गृत्समद बनकर कहता है कि— ( ‘आ त्वा जिघर्मि’ ) = हे प्रभो! मैं तो आपको ही अपने में दीप्त करने का प्रयत्न करता हूँ।
Essence
भावार्थ — जीवन को सुखी बनाने का मार्ग यही है कि हम [ क ] धन का दान करें। [ ख ] वैषयिकवृत्ति से ऊपर उठें। [ ग ] पुण्यवाले उत्तम लोक का निर्माण करें। [ घ ] घर को स्वर्ग बनाते हुए प्रभु-दर्शन के लिए प्रयत्नशील हों।
Subject
स्वर् आरोहण