Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 11 / Mantra 19

83 Mantra
11/19
Devata- अग्निर्देवता Rishi- मयोभूर्ऋषिः Chhand- निचृदनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
आ॒क्रम्य॑ वाजिन् पृथि॒वीम॒ग्निमि॑च्छ रु॒चा त्वम्। भूम्या॑ वृ॒त्वाय॑ नो ब्रूहि॒ यतः॒ खने॑म॒ तं व॒यम्॥१९॥

आ॒क्रम्येत्या॒ऽक्रम्य॑। वा॒जि॒न्। पृ॒थि॒वीम्। अ॒ग्निम्। इ॒च्छ॒। रु॒चा। त्वम्। भूम्याः॑। वृ॒त्वाय॑। नः॒। ब्रूहि॑। यतः॑। खने॑म। तम्। व॒यम् ॥१९ ॥

Mantra without Swara
आक्रम्य वाजिन्पृथिवीमग्निमिच्छ रुचा त्वम् । भूम्या वृक्त्वाय नो ब्रूहि यतः खनेम तँवयम् ॥

आक्रम्येत्याऽक्रम्य। वाजिन्। पृथिवीम्। अग्निम्। इच्छ। रुचा। त्वम्। भूम्याः। वृत्वाय। नः। ब्रूहि। यतः। खनेम। तम्। वयम्॥१९॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. हे ( वाजिन् ) = शक्तिशालिन्! ( पृथिवीम् आक्रम्य ) = इस पृथिवी पर आक्रमण करते हुए, अर्थात् सफलतापूर्वक संसार-यात्रा को चलाते हुए ( त्वम् ) = तू ( रुचा ) = दीप्ति के हेतु से ( अग्निम् ) = उस अग्रेणी परमात्मा को ( इच्छ ) = चाह, उसका अन्वेषण कर। जीव शक्तिशाली बने। शक्तिशाली बनकर गत मन्त्र के अनुसार सन्मार्ग पर चले, विघ्नों को दूर करे और इस प्रकार सफलता से इस पार्थिव संसार में जीवन-यात्रा को चलाते हुए प्रभु की खोज की वृत्तिवाला बने [ seeker after God ]। ऐसा बनने से जीवन दीप्त हो उठता है। पृथिवी पर सफलता से आक्रमण का अभिप्राय स्वर्ग की प्राप्ति है तो ‘प्रभु के अन्वेषण की इच्छा’ उस सोने पर सुहागे का काम करती है। यह स्वर्ण चमक उठता है। 

२. ( भूम्याः ) = भूमि से अर्थात् इन पार्थिव भोगों में फँस जाने की अपेक्षा ( वृत्वाय ) = प्रभु का वरण करके ( नः ब्रूहि ) = तू हमारे प्रति भी उस प्रभु का प्रवचन कर ( यतः ) = जिससे ( वयम् ) = हम भी ( तम् ) = उस प्रभु को ( खनेम ) = खोजनेवाले बनें। ‘खनेम’ शब्द का अर्थ खोदकर निकालना है। पर्वतों में छिपाकर रखे सोने को हम खोदकर निकालते हैं। वहाँ उपरले आवरणों को हटाना होता है, ठीक इसी प्रकार यहाँ अन्नमयादि पाँच कोशों के आवरण को हटाकर आत्मा तक पहुँचते हैं। इस आवरण के हटाने के लिए हम पार्थिव भोगों से ऊपर उठें। ‘आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत्’ का ठीक-ठीक अर्थ यही है कि आत्म-प्राप्ति के लिए पार्थिव भोगों को छोड़ना ही होता है। जीवन तभी चमकता है। ऐहिक कल्याण सफलतापूर्वक जीवन-यात्रा को चलाने में है तो आमुष्यिक कल्याण उस प्रभु को खोजने में है। इन दोनों अभ्युदय व निःश्रेयस को मिला देना ही सच्चा धर्म है।
Essence
भावार्थ — १. हम शक्तिशाली बनकर जीवन-यात्रा को सफलता से चलाएँ २. पार्थिव भोगों में न फँसकर आत्मा का अन्वेषण करें, तभी जीवन दीप्त होगा।
Subject
प्रभु-अन्वेषण [ Seeking after God ]