Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 11 / Mantra 17

83 Mantra
11/17
Devata- अग्निर्देवता Rishi- पुरोधा ऋषिः Chhand- निचृदार्षी त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अन्व॒ग्निरु॒षसा॒मग्र॑मख्य॒दन्वहा॑नि प्रथ॒मो जा॒तवे॑दाः। अनु॒ सूर्य॑स्य पुरु॒त्रा च॑ र॒श्मीननु॒ द्यावा॑पृथि॒वीऽआत॑तन्थ॥१७॥

अनु॑। अ॒ग्निः। उ॒षसा॑म्। अग्र॑म्। अ॒ख्य॒त्। अनु॑। अहा॑नि। प्र॒थ॒मः। जा॒तवे॑दा॒ इति॑ जा॒तऽवे॑दाः। अनु॑। सूर्य॑स्य। पु॒रु॒त्रेति॑ पुरु॒ऽत्रा। च॒। र॒श्मीन्। अनु॑। द्यावा॑पृथि॒वीऽइति॒ द्यावा॑पृथि॒वी। आ। त॒त॒न्थ॒ ॥१७ ॥

Mantra without Swara
अन्वग्निरुषसामग्रमख्यदन्वहानि प्रथमो जातवेदाः । अनु सूर्यस्य पुरुत्रा च रश्मीननु द्यावापृथिवीऽआततन्थ ॥

अनु। अग्निः। उषसाम्। अग्रम्। अख्यत्। अनु। अहानि। प्रथमः। जातवेदा इति जातऽवेदाः। अनु। सूर्यस्य। पुरुत्रेति पुरुऽत्रा। च। रश्मीन्। अनु। द्यावापृथिवीऽइति द्यावापृथिवी। आ। ततन्थ॥१७॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रस्तुत मन्त्र का ऋषि ‘पुरोधाः’ है, जो औरों से पहले अपना धारण करता है। ‘यह अपने को अग्रभाग में कैसे स्थापित कर पाया है’, इस प्रश्न का उत्तर प्रस्तुत मन्त्र में देते हैं कि १. यह ( अग्निः ) = निरन्तर अपने को आगे और आगे प्राप्त करानेवाला व्यक्ति ( उषसाम् अग्रम् अनु ) = उषा के अग्रभागों के साथ-साथ, अर्थात् प्रत्येक उषाकाल के प्रारम्भ में ( अख्यत् ) = उस प्रभु के गुणों का प्रकथन करता है। [ ख्या प्रकथने ]। इसका दैनिक कार्यक्रम प्रभु-गुण स्मरण से प्रारम्भ होता है। 

२. ( अहानि अनु ) = प्रत्येक दिन के साथ, अर्थात् प्रतिदिन यह ( प्रथमः ) = [ प्रथ विस्तारे ] अपनी शक्तियों का विस्तार करता है, शक्ति-विस्तार के लिए यह प्रतिदिन के व्यायाम आदि को नियम से करता है। 

३. ( जातवेदाः ) = प्रत्येक उत्पन्न पदार्थ का ज्ञान प्राप्त करने का प्रयत्न करता है। नैत्यिक स्वाध्याय से यह अपने ज्ञान को बढ़ाता चलता है। एवं, प्रभु-स्तवन, व्यायामादि व स्वाध्याय तो यह सूर्योदय से पहले ही कर लेता है ( च ) = और ४. ( सूर्यस्य रश्मीन् अनु ) = सूर्य की रश्मियों के ख़ूब फैलने के साथ ( पुरुत्रा ) = यह बहुत ही स्थानों पर जाता है। जीविकोपार्जन के लिए यह विविध स्थानों पर आता-जाता है, परन्तु यह ध्यान रखता कि कहीं इसके मस्तिष्क व शरीर पर अवाञ्छनीय प्रभाव न हो जाए। 

५. जीविकोपार्जन के अपने प्रयत्नों को यह ( आततन्थ ) = विस्तृत तो करता है, परन्तु ( द्यावापृथिवी अनु ) = अपने मस्तिष्क व शरीर के स्वास्थ्य का ध्यान करते हुए। इनके स्वास्थ्य के साथ-साथ यह धनार्जन करने का विचार करता है। कार्य को इतना नहीं फैला देता कि उसके न सँभलने से वह इसकी सिरदर्दी का ही कारण बन जाए।
Essence
भावार्थ — १. उषा के प्रारम्भ से पहले ही उठकर यह प्रभु-कीर्तन करता है। २. उचित व्यायाम करता है। ३. प्रभु के बनाये पदार्थों की रचना का ज्ञान प्राप्त करता है जिससे इनमें प्रभु की महिमा को देखे और इन पदार्थों का ठीक प्रयोग कर सके। ४. अब आजीविका के लिए कर्म में लगता है। ५. कार्य को इतना नहीं फैला लेता कि यह उसके मस्तिष्क की चिन्ताओं का कारण बन जाए और शरीर को दूषित कर दे।
Subject
‘पुरोधाः’ का दैनिक कार्यक्रम