Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 11 / Mantra 13

83 Mantra
11/13
Devata- वाजी देवता Rishi- कुश्रिर्ऋषिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
यु॒ञ्जाथा॒ रास॑भं यु॒वम॒स्मिन् यामे॑ वृषण्वसू। अ॒ग्निं भर॑न्तमस्म॒युम्॥१३॥

यु॒ञ्जाथा॑म्। रास॑भम्। यु॒वम्। अ॒स्मिन्। यामे॑। वृ॒ष॒ण्व॒सू॒ इति॑ वृषण्ऽवसू। अ॒ग्निम्। भर॑न्तम्। अ॒स्म॒युमित्य॑स्म॒ऽयुम् ॥१३ ॥

Mantra without Swara
युञ्जाथाँ रासभँयुवमस्मिन्यामे वृषण्वसू । अग्निम्भरन्तमस्मयुम् ॥

युञ्जाथाम्। रासभम्। युवम्। अस्मिन्। यामे। वृषण्वसू इति वृषण्ऽवसू। अग्निम्। भरन्तम्। अस्मयुमित्यस्मऽयुम्॥१३॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गत मन्त्र की भावना के अनुसार जो पति-पत्नी प्रभु को अपने जीवन का केन्द्र बनाते हैं वे ( वृषण्वसू ) = शक्तिशाली अथवा सुखों के वर्षक प्रभुरूप धनवाले होते हैं। इन पति-पत्नी से कहते हैं कि— २. ( युवम् ) = तुम दोनों ( अस्मिन् यामे ) = इस जीवन-मार्ग में ( रासभम् ) =  [ रास् शब्दे ] हृदयस्थ होकर सदा ज्ञान के शब्दों का उच्चारण करनेवाले उस प्रभु को ( युञ्जाथाम् ) = अपने साथ युक्त करने का प्रयत्न करो। तुम्हारा मन उस प्रभु में लगे और तुम उस प्रभु की वाणी को सुनने के लिए यत्नशील होओ। 

३. वे प्रभु ( अग्निं भरन्तम् ) = हमारे अन्दर अग्नि का भरण करनेवाले हैं—हमारे जीवन में उत्साह का सञ्चार करनेवाले हैं और ( अस्मयुम् ) = [ अस्मान् कामयमानम्—उ० ] सदा हमारा हित चाहनेवाले हैं, अतः प्रभु की वाणी को सुनने से अवश्य हमारा भला ही होगा और हमें जीवन में कभी निराशा न होगी। हम सदा सोत्साह बने रहेंगे। ३ वे प्रभु प्रस्तुत मन्त्र में ‘रासभ’ कहे गये हैं—वे [ रास् शब्दे ] हृदयस्थरूपेण सब विद्याओं का उपदेश देते रहते हैं। इन विद्याओं का उपदेश देने से ही वे ‘कु’ [ कौति सर्वा विद्याः ] कवि हैं। उनकी [ श्रि सेवायाम् ] उपासना करने से प्रस्तुत मन्त्र का ऋषि ‘कु-श्रि’ है। यह इस ‘कु’ = कवि की काव्यमय वाणियों में उत्साह व हित देखता है। उसी का उपासन, मनन करता है।
Essence
भावार्थ — हम अपनी जीवन-यात्रा में प्रभु को अपने से युक्त करके चलें। उस प्रभु की वाणियाँ हमारे जीवन में अग्नि = उष्णता व उत्साह का सञ्चार करेंगी।
Subject
रासभ-योग