Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 11 / Mantra 10

83 Mantra
11/10
Devata- सविता देवता Rishi- प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- भुरिगनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
अभ्रि॑रसि॒ नार्य॑सि॒ त्वया॑ व॒यम॒ग्निꣳ श॑केम॒ खनि॑तुꣳ स॒धस्थ॒ आ। जाग॑तेन॒ छन्द॑साङ्गिर॒स्वत्॥१०॥

अभ्रिः॑। अ॒सि॒। नारी॑। अ॒सि॒। त्वया॑। व॒यम्। अ॒ग्निम्। श॒के॒म॒। खनि॑तुम्। स॒धस्थ॒ इति॑ स॒धस्थे॑। आ। जाग॑तेन। छन्द॑सा। अ॒ङ्गि॒र॒स्वत् ॥१० ॥

Mantra without Swara
अभ्रिरसि नार्यसि त्वया वयमग्निँ शकेम खनितुँ सधस्थ आ जागतेन छन्दसाङ्गिरस्वत् ॥

अभ्रिः। असि। नारी। असि। त्वया। वयम्। अग्निम्। शकेम। खनितुम्। सधस्थ इति सधस्थे। आ। जागतेन। छन्दसा। अङ्गिरस्वत्॥१०॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. श० ६।४।१।५ में ‘वाग्वा अभ्रिः’ [ अभ्रति गच्छति मलं यस्मात् ] इन शब्दों में वेदवाणी को ‘अभ्रि’ कहा है। इस वेदवाणी के द्वारा हमारे सब मल दूर होते हैं, अतः ( अभ्रिः असि ) = तू अभ्रि है। इन ज्ञान की वाणियों से हमारा जीवन पवित्र होता है। 

२. ( नारी असि ) = जीवन को पवित्र करके तू नरहित को सिद्ध करनेवाली है। 

३. ( त्वया ) = तेरे द्वारा ( वयम् ) = हम ( अग्निम् ) = उस अग्रेणी प्रभु को ( खनितुं शकेम ) = खोदने में समर्थ हों। ( खन् ) = excavate, cave में से—गुहा में से—बाहर ला सकें। वे प्रभु ‘गुहाहितं’-गह्वरेष्ठम्’ हैं। हम एक-एक कोश को अलग करते हुए उस प्रभु तक पहुँच सकें। 

४. ( जागतेन छन्दसा ) = लोकहित की प्रबल कामना से ( सधस्थे ) = मिलकर एक स्थान पर बैठने की इस जगह पर, अर्थात् यज्ञवेदी पर ( आ ) = एकत्र होकर हम ( अङ्गिरस्वत् ) = अङ्गिरस् की भाँति बनें। यह अग्निहोत्र, वायुमण्डल की शुद्धि के द्वारा नीरोगता को उत्पन्न करके लोकहित का साधक होता है।
Essence
भावार्थ — हम हृदयरूप गुहा में स्थित प्रभु का दर्शन करने का प्रयत्न करें। उस कार्य में यह वेदवाणी हमारी सहायिका होगी। यह हमारे सब मलों को दूर करती है। शुद्ध हृदय में प्रभु का प्रकाश होता है। लोकहित के दृष्टिकोण से हम अग्निहोत्र को अपनाएँ। यह वायु-शुद्धि द्वारा नीरोगता को उत्पन्न कर जगती का कल्याण करता है।
Subject
‘जागत’ छन्द