Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 10 / Mantra 7

34 Mantra
10/7
Devata- वरुणो देवता Rishi- वरुण ऋषिः Chhand- विराट् आर्षी त्रिष्टुप्, Swara- धैवतः
Mantra with Swara
स॒ध॒मादो॑ द्यु॒म्निनी॒राप॑ऽए॒ताऽअना॑धृष्टाऽअप॒स्यो वसा॑नाः। प॒स्त्यासु चक्रे॒ वरु॑णः स॒धस्थ॑मपा शिशु॑र्मा॒तृत॑मास्व॒न्तः॥७॥

स॒ध॒माद॒ इति॑ सध॒ऽमादः॑। द्यु॒म्निनीः॑। आपः॑। ए॒ताः। अना॑धृष्टाः। अ॒प॒स्यः᳕। वसा॑नाः। प॒स्त्या᳖सु। च॒क्रे॒। वरु॑णः। स॒धस्थ॒मिति॑ स॒धऽस्थ॑म्। अ॒पाम्। शिशुः॑। मा॒तृत॑मा॒स्विति॑ मा॒तृऽत॑मासु। अ॒न्तरित्य॒न्तः ॥७॥

Mantra without Swara
सधमादो द्युम्निनीरापऽएताऽअनाधृष्टाऽअपस्यो वसानाः । पस्त्यासु चक्रे वरुणः सधस्थमपाँ शिशुर्मातृतमास्वन्तः ॥

सधमाद इति सधऽमादः। द्युम्निनीः। आपः। एताः। अनाधृष्टाः। अपस्यः। वसानाः। पस्त्यासु। चक्रे। वरुणः। सधस्थमिति सधऽस्थम्। अपाम्। शिशुः। मातृतमास्विति मातृऽतमासु। अन्तरित्यन्तः॥७॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रजाओं का चित्रण करते हुए कहते हैं कि १. ( ये सधमादः ) = [ सह मद् ] साथ—मिलकर रहने में आनन्द लेनेवाली हैं। प्रजाओं में परस्पर प्रेम है—लड़ाई-झगड़ों में ये उलझी हुई नहीं हैं। 

२. ( द्युम्निनीः ) = ज्ञानरूप ज्योतिवाली हैं, मूर्ख नहीं है। 

३. ( आपः ) = सदा कर्मों में व्याप्त रहनेवाली हैं। 

४. इसी कारण ( एताः ) = ये प्रजाएँ ( अनाधृष्टाः ) = काम-क्रोधादि शत्रुओं से धर्षित होनेवाली नहीं हैं। 

५. ( अपस्यः ) = [ अपःसु कर्मसु साध्व्यः, जस् = सुः—द० ] कर्मों में उत्तम हैं, अर्थात् सदा उत्तम कर्मों में व्यापृत रहती हैं। 

६. ( वसानाः ) = अपने को आच्छादित करनेवाली हैं, दोषों से बचानेवाली हैं। 

७. ( पस्त्यासु ) = घरों में रहनेवाली ऐसी प्रजाओं में ( वरुणः ) = प्रजाओं से वरण किया गया राजा ( सधस्थं चक्रे ) = [ सह स्थ ] उनके साथ मिलकर निवास करता है। यह प्रजाओं से दूर, उनके लिए अनभिगम्य नहीं बन जाता। 

८. ( अपां शिशुः ) = प्रजाओं का ही यह सन्तान है। प्रजाओं ने ही इसे जन्म दिया है। इसी कारण प्रजाएँ ‘राजस्वः’ कहलाती हैं। यह प्रजाओं का सन्तानभूत राजा ( मातृतमासु अन्तः ) = इन अत्यन्त उत्तम माताओं के अन्दर ही निवास करता है। राजा एक दृष्टिकोण से प्रजारूप मातावाला है। उन्हीं के गर्भ में इसका निवास है। प्रजाओं को माता इसलिए कहा है कि उन्हें राष्ट्र में सदा निर्माण के कार्यों में व्यापृत रहना चाहिए। माता निर्माता = निर्माण करनेवाली ही राष्ट्र की उत्तम माताएँ होती हैं।
Essence
भावार्थ — उत्तम प्रजाएँ वे ही हैं जो परस्पर मेलवाली, ज्ञान के प्रकाशवाली, कर्मों में व्यापृत, वासनाओं से अनाधृष्ट, कर्म-कुशल व दोषों से अपने को बचानेवाली हैं। इन्हीं प्रजाओं के अन्दर राजा का निवास है। राजा प्रजाओं की सन्तान है, प्रजाएँ राजा की उत्कृष्ट माताएँ हैं।
Subject
अपां शिशुः