Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 10 / Mantra 5

34 Mantra
10/5
Devata- अग्न्यादयो मन्त्रोक्ता देवताः Rishi- वरुण ऋषिः Chhand- स्वराट धृति, Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
सोम॑स्य॒ त्विषि॑रसि॒ तवे॑व मे॒ त्विषि॑भूर्यात्। अ॒ग्नये॒ स्वाहा॒ सोमा॑य॒ स्वाहा॑ सवि॒त्रे स्वाहा॒ सर॑स्वत्यै॒ स्वाहा॑ पू॒ष्णे स्वाहा॒ बृह॒स्पत॑ये॒ स्वाहेन्द्रा॑य॒ स्वाहा॒ घोषा॑य॒ स्वाहा॒ श्लोक॑ाय॒ स्वाहाशा॑य॒ स्वाहा॒ भगा॑य॒ स्वाहा॑र्य॒म्णे स्वाहा॑॥५॥

सोम॑स्य। त्विषिः॑। अ॒सि॒। तवे॒वेति तव॑ऽइव। मे॒। त्विषिः॑। भू॒या॒त्। अ॒ग्नये॑। स्वाहा॑। सोमा॑य। स्वाहा॑। स॒वि॒त्रे। स्वाहा॑। सर॑स्वत्यै। स्वाहा॑। पू॒ष्णे। स्वाहा॑। बृह॒स्पत॑ये। स्वाहा॑। इन्द्रा॑य। स्वाहा॑। घोषा॑य। स्वाहा॑। श्लोका॑य। स्वाहा॑। अꣳशा॑य। स्वाहा॑। भगा॑य। स्वाहा॑। अ॒र्य्य॒म्णे स्वाहा॑ ॥५॥

Mantra without Swara
सोमस्य त्विषिरसि तवेव मे त्विषिर्भूयात् अग्नये स्वाहा सोमाय स्वाहा सवित्रे स्वाहा सरस्वत्यै स्वाहा पूष्णे स्वाहा बृहस्पतये स्वाहेन्द्राय स्वाहा घोषाय स्वाहा श्लोकाय स्वाहाँशाय स्वाहा भगाय स्वाहार्यम्णे स्वाहा ॥

सोमस्य। त्विषिः। असि। तवेवेति तवऽइव। मे। त्विषिः। भूयात्। अग्नये। स्वाहा। सोमाय। स्वाहा। सवित्रे। स्वाहा। सरस्वत्यै। स्वाहा। पूष्णे। स्वाहा। बृहस्पतये। स्वाहा। इन्द्राय। स्वाहा। घोषाय। स्वाहा। श्लोकाय। स्वाहा। अꣳशाय। स्वाहा। भगाय। स्वाहा। अर्य्यम्णे स्वाहा॥५॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रजा राजा से कहती है कि १. ( सोमस्य त्विषिः असि ) = तू सोम की कान्तिवाला है। शरीर में सोम की रक्षा के द्वारा तू अद्भुत तेजस्विता को धारण किये हुए है। ( मे ) = मेरी ( त्विषिः ) = दीप्ति ( तव इव ) = तेरे समान ( भूयात् ) = हो। हम सब भी सोम की रक्षा के द्वारा कान्ति-सम्पन्न बनें। 

२. ( अग्नये स्वाहा ) = राष्ट्र को निरन्तर आगे ले-चलनेवाले तेरे लिए हम कररूप में धन देते हैं। 

३. ( सोमाय ) = सोम की रक्षा के द्वारा शक्ति के पुञ्ज, परन्तु फिर भी सौम्य आपके लिए हम ( स्वाहा ) = कररूप में धन देते हैं। 

४. ( सवित्रे स्वाहा ) = राष्ट्र का ऐश्वर्य बढ़ानेवाले आपके लिए हम कर देते हैं। 

५. ( सरस्वत्यै स्वाहा ) = राष्ट्र के प्रत्येक व्यक्ति को शिक्षित करनेवाले आपके लिए हम कर देते हैं। 

६. ( पूष्णे स्वाहा ) = एक-एक व्यक्ति का पोषण करनेवाले, किसी को भी भूखा न मरने देनेवाले आपके लिए हम कर देते हैं। 

७. ( बृहस्पतये स्वाहा ) = सर्वोच्च दिशा के अधिपति और अतएव लोगों को भी उत्थान की ओर ले-चलनेवाले आपके लिए हम कर देते हैं। 

८. ( इन्द्राय स्वाहा ) = जितेन्द्रिय के लिए और जितेन्द्रिय बनकर औरों को भी वश में करनेवाले आपके लिए हम कर देते हैं। 

९. ( घोषाय स्वाहा ) = प्रातः वेदमन्त्रों का उच्चारण करनेवाले आपके लिए अथवा राष्ट्र में राष्ट्रीय नियमों की उद्घोषणा करवानेवाले आपके लिए हम कर देते हैं। 

१०. ( श्लोकाय स्वाहा ) = उत्तम कर्मों के कारण यशस्वी आपके लिए हम कर देते हैं। 

११. ( अंशाय स्वाहा ) = राष्ट्र में धनों का ठीक विभाजन करनेवाले आपके लिए हम कर देते हैं। राजा को इस बात का बड़ा ध्यान करना है कि किसी एक व्यक्ति में अत्यधिक धन केन्द्रित न हो जाए, और कुछ लोग धनाभाव से भूखे न मरने लगें। उसके राष्ट्र में haves और have-nots के—अत्यधिक धनी व अतिनिर्धन के दो समाजखण्ड न बन जाएँ। 

१२. ( भगाय स्वाहा ) = उत्तम कर्मों का सेवन करनेवाले राजा के लिए हम कर देते हैं ‘भज सेवायाम्’। 

१३. ( अर्यम्णे स्वाहा ) = [ अरीन् यच्छति ] शत्रुओं को वशीभूत करनेवाले राजा के लिए हम कर देते हैं। अथवा ‘अर्यमा इति तमाहुर्यो ददाति’ इस वाक्य के अनुसार अर्यमा वह है जो देता है। ‘भग’ शब्द ऐश्वर्यवाचक है, अतः १२ व १३ का अर्थ इस प्रकार भी हो सकता है कि हम उस राजा को कर देते हैं जो ख़ूब ऐश्वर्य को सिद्ध करनेवाला बनकर हम सब प्रजाओं के लिए ही उस धन का उचित विनियोग करे।
Essence
भावार्थ — राजा को अग्नि आदि के गुणों से सम्पन्न होकर उत्तमता से राष्ट्र की सुव्यवस्था करनी है।
Subject
राजा