Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 10 / Mantra 34

34 Mantra
10/34
Devata- अश्विनौ देवते Rishi- शुनःशेप ऋषिः Chhand- भूरिक पङ्क्ति, Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
पु॒त्रमि॑व पि॒तरा॑व॒श्विनो॒भेन्द्रा॒वथुः॒ काव्यै॑र्द॒ꣳसना॑भिः। यत्सु॒रामं॒ व्यपि॑बः॒ शची॑भिः॒ सर॑स्वती त्वा मघवन्नभिष्णक्॥३४॥

पु॒त्रमि॒वेति॑ पु॒त्रम्ऽइ॑व। पि॒तरौ॑। अ॒श्विना॑। उ॒भा। इन्द्र॑। आ॒वथुः॑। काव्यैः॑। द॒ꣳसना॑भिः। यत्। सु॒राम॑म्। वि। अपि॑बः। शची॑भिः। सर॑स्वती। त्वा॒ म॒घ॒व॒न्निति॑ मघऽवन्। अ॒भि॒ष्ण॒क् ॥३४॥

Mantra without Swara
पुत्रमिव पितरावश्विनोभेन्द्रावथुः काव्यैर्दँसनाभिः । यत्सुरामँव्यपिबः शचीभिः सरस्वती त्वा मघवन्नभिष्णक् ॥

पुत्रमिवेति पुत्रम्ऽइव। पितरौ। अश्विना। उभा। इन्द्र। आवथुः। काव्यैः। दꣳसनाभिः। यत्। सुरामम्। वि। अपिबः। शचीभिः। सरस्वती। त्वा मघवन्निति मघऽवन्। अभिष्णक्॥३४॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. हे ( इन्द्र ) = इन्द्रियों के अधिष्ठाता जीव! ( इव पितरौ ) = जैसे माता-पिता ( पुत्रम् ) = पुत्र को ( अवथुः ) = रक्षित करते हैं, इसी प्रकार ( काव्यैः ) = कवि-कर्मों से, मन्त्र-दर्शनों से, अर्थात् तत्त्व-ज्ञान की प्रतिपादिका वाणियों से तथा ( दंसनाभिः ) = उत्तम कर्मों से ( उभा अश्विना ) = ये दोनों प्राणापान ( अवथुः ) = तेरी रक्षा करते हैं। प्राण-साधना से जहाँ इन्द्रियदोष दूर होकर अपवित्र कर्म नहीं होते वहाँ बुद्धि तीव्र होकर सूक्ष्म-तत्त्वों के ज्ञानवाली भी होती है। 

२. इस प्राण-साधना से सोम की भी शरीर में ऊर्ध्व गति होती है। हे इन्द्र! ( यत् ) = जब तू ( सुरामम् ) = सुरमणीय इस सोम को ( व्यपिबः ) = पीता है, जब इसका अपव्यय न होने देकर तू इसे शरीर में ही सुरक्षित करता है तब ( शचीभिः ) = उत्तम प्रज्ञानों व कर्मों से ( सरस्वती ) = यह विद्या की अधिदेवता हे ( मघवन् ) = ज्ञानैश्वर्य-सम्पन्न तथा [ मघ = यज्ञ ] यज्ञमय जीवनवाले जीव! ( त्वा ) = तुझे ( अभिष्णक् ) = उपसेवित करती है। [ निणाज् उपसेवायाम् ]। 

३. यह प्रज्ञान व यज्ञात्मक कर्म ही वे दो पंख हैं, जिनसे जीवरूप सुपर्ण उस प्रभु-रूप सुपर्ण को प्राप्त करता है। सुपर्ण को सुपर्ण बनकर ही पाया जा सकता है, अतः हम ज्ञान व यज्ञकर्म रूप सुपर्णोंवाले बनें और इसके लिए प्राण-साधना करें।
Essence
भावार्थ — प्राण-साधना से हम तत्त्व-ज्ञान व यज्ञात्मक कर्मोंवाले बनें, यही प्रभु-प्राप्ति का मार्ग है।
Subject
प्राणापान का रक्षक