Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 10 / Mantra 33

34 Mantra
10/33
Devata- अश्विनौ देवते Rishi- शुनःशेप ऋषिः Chhand- निचृत् अनुष्टुप्, Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
यु॒वꣳ सु॒राम॑मश्विना॒ नमु॑चावासु॒रे सचा॑। वि॒पि॒पा॒ना शु॑भस्पती॒ऽइन्द्रं॒ कर्म॑स्वावतम्॥३३॥

यु॒वम्। सु॒राम॑म्। अ॒श्वि॒ना॒। नमु॑चौ। आ॒सु॒रे। सचा॑। वि॒पि॒पा॒नेति॑ विऽपि॒पा॒ना। शु॒भः॒। प॒ती॒ऽइति॑ पती। इन्द्र॑म्। कर्म॒स्विति॒ कर्म॑ऽसु। आ॒व॒त॒म् ॥३३॥

Mantra without Swara
वयँ सुराममश्विना नमुचावासुरे सचा । विपिपाना शुभस्पती इन्द्रङ्कर्मस्वावतम् ॥

युवम्। सुरामम्। अश्विना। नमुचौ। आसुरे। सचा। विपिपानेति विऽपिपाना। शुभः। पतीऽइति पती। इन्द्रम्। कर्मस्विति कर्मऽसु। आवतम्॥३३॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. जब जीवात्मा परमात्मा से सम्पर्क स्थापित कर लेता है तब प्रभु पति हैं जीवात्मा पत्नी है। उस समय ( युवम् ) = तुम दोनों ( अश्विना ) = [ अश् व्याप्तौ ] कर्मों में व्याप्त होनेवाले, ( आसुरे नमुचा ) = असुरों के प्रधान अहंकार [ न+मुच् ] के संहार के निमित्त ( सचा ) = मेलवाले ( सुरामम् ) = उत्तम रमणीय सोम को [ सुरमणीयम् ] ( विपिपाना ) = विशेषरूप से पीते हुए ( शुभस्पती ) =  शुभ कार्यों के रक्षक होते हुए ( इन्द्रम् ) = इन्द्र को ( कर्मसु ) = कर्मों के करने के निमित्त ( आवतम् ) =  पालित करो, अर्थात् इन्द्र को स्वकर्मक्षम बनाओ। 

२. परमात्मा व जीवात्मा पति-पत्नी के समान हैं। दोनों ( अश्विना ) = कर्मों में व्याप्त रहनेवाले हैं। प्रयत्न उनका गुण है। प्रभु के कर्म सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति व प्रलयरूप हैं। जीव के कर्म ज्ञानोपार्जन, सन्तान-पालन, आत्म-दर्शन व ज्ञान-प्रसार आदि हैं। 

३. परमात्मा अहंकार शून्य है। जीव में अल्पज्ञता के कारण अहंकार आ जाता है, परन्तु जब यह जीव प्रभु के सम्पर्क में आता है तब अहंकार को जीत लेता है। उसी समय अन्य वासनाओं के विजय से यह सोम के पान में भी समर्थ होता है—वीर्य-रक्षा कर पाता है। इस सोमपान का परिणाम यह होता है कि यह शुभ कार्यों में प्रवृत्त होता है, अशुभ कर्मों का त्याग कर देता है। 

४. इस सोमपान से उसकी सब इन्द्रियों की शक्ति का वर्धन होता है और वह इन्द्र स्वकर्मक्षम बनता है।
Essence
भावार्थ — परमात्मा के सम्पर्क से हमारा अहंकार नष्ट हो। हम सोम का पान करें और शुभ कार्यों में प्रवृत्त रहें।
Subject
पति-पत्नी [ आत्मा+परमात्मा ]