Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 10 / Mantra 31

34 Mantra
10/31
Devata- क्षत्रपतिर्देवता Rishi- शुनःशेप ऋषिः Chhand- आर्षी त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ॒श्विभ्यां॑ पच्यस्व॒ सर॑स्वत्यै पच्य॒स्वेन्द्रा॑य सु॒त्राम्णे॑ पच्यस्व। वा॒युःपू॒तः प॒वित्रे॑ण प्र॒त्यङ्क्सोमो॒ अति॑स्रुतः। इन्द्र॑स्य॒ युज्यः॒ सखा॑॥३१॥

अ॒श्विभ्या॒मित्य॒श्विऽभ्या॑म्। प॒च्य॒स्व॒। सर॑स्वत्यै। प॒च्य॒स्व॒। इन्द्रा॑य। सु॒त्राम्ण॒ इति॑ सु॒ऽत्राम्णे॑। प॒च्य॒स्व॒। वा॒युः। पू॒तः। प॒वित्रे॑ण। प्र॒त्यङ्। सोमः॑। अति॑स्रुत॒ इत्यति॑ऽस्रु॒तः। इन्द्र॑स्य। युज्यः॑। सखा॑ ॥३१॥

Mantra without Swara
अश्विभ्याम्पच्यस्व सरस्वत्यै पच्यस्वेन्द्राय सुत्राम्णे पच्यस्व । वायुः पूतः पवित्रेण प्रत्यङ्क्सोमो अतिस्रुतः । इन्द्रस्य युज्यः सखा ॥

अश्विभ्यामित्यश्विऽभ्याम्। पच्यस्व। सरस्वत्यै। पच्यस्व। इन्द्राय। सुत्राम्ण इति सुऽत्राम्णे। पच्यस्व। वायुः। पूतः। पवित्रेण। प्रत्यङ्। सोमः। अतिस्रुत इत्यतिऽस्रुतः। इन्द्रस्य। युज्यः। सखा॥३१॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गत मन्त्र के अनुसार देवों से प्रेरणा प्राप्त करके जब हम अपनी जीवन-यात्रा में चलेंगे तो यात्रा के अन्तिम प्रयाण = पड़ाव तक पहुँचेंगे। यह अन्तिम प्रयाण प्रस्तुत मन्त्र की समाप्ति पर ‘इन्द्रस्य युज्यः सखा’ इन शब्दों में कहा गया है। हे जीव! अब तो तू उस ( इन्द्रस्य ) = परमैश्वर्यशाली, सर्वशक्तिमान् प्रभु का ( युज्यः ) = सदा साथ रहनेवाला ( सखा ) = मित्र हो गया है। 

२. ऐसा बनने के लिए तू ( अश्विभ्याम् ) = प्राणापान के लिए ( पच्यस्य ) = अपना परिपाक कर। प्राणापान की साधना में अपने को परिपक्व कर। प्राणायाम के दैनन्दिन अभ्यास से तू इन्हें अपने वश में करनेवाला बन। 

३. ( सरस्वत्यै ) = विद्या की अधिदेवता के लिए ( पच्यस्व ) = तू अपना परिपाक कर। ज्ञानाग्नि में अपने को परिपक्व करके वैदुष्य प्राप्त कर। 

४. इस प्रकार प्राण व ज्ञान की अग्नि में अपने को परिपक्व करता हुआ तू ( सुत्राम्णे ) =  अत्यन्त उत्तम रक्षक ( इन्द्रस्य ) = परमैश्वर्यवान्, सर्वशत्रुसंहारक प्रभु के लिए ( पच्यस्व ) = परिपक्व बन। प्राण-साधना और ज्ञान-प्राप्ति ही तुझे प्रभु-प्राप्ति-क्षम करेंगी। 

५. प्रभु-प्राप्ति के मार्ग पर चलता हुआ तू ( वायुः ) = [ वा गतिगन्धनयोः ] गति के द्वारा सब बुराइयों का हिंसन करनेवाला होगा। क्रियाशील बना रहकर तू अपने में मलिनता को न आने देगा। 

६. और वस्तुतः ( पवित्रेण पूतः ) = तू ज्ञान से निरन्तर पवित्र किया जा रहा होगा। ज्ञानाग्नि तेरी सब रागद्वेषादि मलिनताओं को भस्म कर रही होगी। इन मलिनताओं के दूर हो जाने पर ७. ( प्रत्यङ् सोमः ) = तू अपने अन्दर उस ( सोम ) = शान्तात्मावाला होगा [ You will realise the God within ]। तुझे हृदयस्थ प्रभु के दर्शन होंगे। 

८. ( अतिस्रुतः ) = [ स्रु गतौ ] ब्रह्मनिष्ठ होकर तू अतिशयेन क्रियाशील होगा। तेरा जीवन अकर्मण्य न होगा। और ९. तू ( इन्द्रस्य युज्यः सखा ) = उस प्रभु का सतत साथ रहनेवाला मित्र बनेगा।
Essence
भावार्थ — प्राण-साधना व ज्ञान-प्राप्ति मुझे उस सोम का सतत सखा बनने में समर्थ करें।
Subject
प्रभु का सतत मित्र