Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 10 / Mantra 26

34 Mantra
10/26
Devata- वरुणो देवता Rishi- शुनःशेप ऋषिः Chhand- भूरिक अनुष्टुप्, Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
स्यो॒नासि॑ सु॒षदा॑सि क्ष॒त्रस्य॒ योनि॑रसि। स्यो॒नामासी॑द सु॒षदा॒मासी॑द क्ष॒त्रस्य॒ योनि॒मासी॑द॥२६॥

स्यो॒ना। अ॒सि॒। सु॒षदा॑। सु॒सदेति॑ सु॒ऽसदा॑। अ॒सि॒। क्ष॒त्रस्य॑। योनिः॑। अ॒सि॒। स्यो॒नाम्। आ। सी॒द॒। सु॒षदा॑म्। सु॒सदा॒मिति॑ सु॒ऽसदा॑म्। आ। सी॒द॒। क्ष॒त्रस्य॑। योनि॑म्। आ। सी॒द॒ ॥२६॥

Mantra without Swara
स्योनासि सुषदासि क्षत्रस्य योनिरसि स्योनामासीद सुषदामासीद क्षत्रस्य योनिमासीद ॥

स्योना। असि। सुषदा। सुसदेति सुऽसदा। असि। क्षत्रस्य। योनिः। असि। स्योनाम्। आ। सीद। सुषदाम्। सुसदामिति सुऽसदाम्। आ। सीद। क्षत्रस्य। योनिम्। आ। सीद॥२६॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
गत मन्त्र की भावना के अनुसार प्रभु-स्मरण से शक्ति-सम्पन्न बनकर निरन्तर क्रिया करनेवाला व्यक्ति इस पृथिवी को बड़ा सुन्दर बनाता है। मन्त्र में कहते हैं कि १. हे पृथिवि! तू ( स्योना असि ) = सुखरूप है। प्रयत्नशील व्यक्ति के लिए पृथिवी सुखरूप है ही। 

२. ( सु-सदा असि ) = सुख से बैठने के योग्य है [ सुखेन सीदन्ति यस्याम् ]। श्रमशील लोग तेरे आश्रय से जीवन व्यतीत करते हैं। 

३. ( क्षत्रस्य योनिः असि ) = क्रियाशीलता के द्वारा बल का तू कारण है। इस पृथिवी पर निवास करते हुए हम यदि क्रियाशील बनते हैं तो शक्ति-सम्पन्न भी होते हैं। क्रियाशीलता व शक्ति आनुपातिक हैं। 

४. वामदेव से कहते हैं कि हे वामदेव! तू ( स्योनाम् ) = इस सुखरूप पृथिवी पर ( आसीद ) = आसीन हो। ( सु-षदाम् आसीद ) = सुख से बैठने योग्य इस पृथिवी पर आसीन हो। ( क्षत्रस्य योनिम् ) = बल की कारणभूत इस पृथिवी पर ( आसीद ) = आसीन हो।
Essence
भावार्थ — यह पृथिवी सुखरूप है, सुख से बैठने योग्य है, शक्ति का स्रोत है। निरन्तर क्रियाशीलता के द्वारा ‘वामदेव’ पृथिवी को ऐसा ही बना लेता है।
Subject
स्योना-सुषदा