Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 10 / Mantra 15

34 Mantra
10/15
Devata- मित्रावरुणौ देवते Rishi- वरुण ऋषिः Chhand- विराट् आर्ची पङ्क्ति, Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
सोम॑स्य॒ त्विषि॑रसि॒ तवे॑व मे॒ त्विषि॑र्भूयात्। मृ॒त्योः पा॒ह्योजो॑ऽसि॒ सहो॑ऽस्य॒मृत॑मसि॥१५॥

सोम॑स्य। त्विषिः॑। अ॒सि॒। तवे॒वेति॒ तव॑ऽइव। मे॒। त्विषिः॑। भू॒या॒त्। मृ॒त्योः। पा॒हि॒। ओजः॑। अ॒सि॒। सहः॒। अ॒सि॒। अ॒मृत॑म्। अ॒सि॒ ॥१५॥

Mantra without Swara
सोमस्य त्विषिरसि तवेव मे त्विषिर्भूयात् । मृत्योः पाह्योजोसि सहोस्यमृतमसि ॥

सोमस्य। त्विषिः। असि। तवेवेति तवऽइव। मे। त्विषिः। भूयात्। मृत्योः। पाहि। ओजः। असि। सहः। असि। अमृतम्। असि॥१५॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रस्तुत मन्त्र का देवता ‘परमात्मा’ है। उससे प्रार्थना करते हैं कि १. हे परमात्मन्! ( सोमस्य त्विषिः असि ) = तू चन्द्र की दीप्ति है। चन्द्रमा की दीप्ति में सौन्दर्य यह है कि यह प्रकाशमय है और प्रकाश के साथ शान्ति देनेवाला है। एवं, इसमें दीप्ति व शान्ति का मेल है। ( मे ) = मेरी ( त्विषिः ) = दीप्ति ( तव इव ) = तेरी भाँति ही ( भूयात् ) = हो। 

२. हे आत्मन्! ( ओजः असि ) = तू ओज का पुञ्ज है [ splendour, light ], प्रकाश का पुञ्ज है। ( सहः असि ) = सहस् का पुतला है, सहनशक्ति का तू स्वरूप ही है। ( अमृतम् असि ) = तू अमृत है। मृत्यु से तू परे है। काल का भी तू काल है। आप मुझे भी ( मृत्योः पाहि ) = मृत्यु से बचाइए। मेरे मस्तिष्क में प्रकाश [ ओज ] हो, मेरे मन में ‘सहस्’ हो तथा मेरे शरीर में अमृतत्व = नीरोगता हो। इस प्रकार तीनों क्षेत्रों में स्वस्थ होकर मैं सोम की त्विषिवाला होऊँ।
Essence
भावार्थ — मुझे ओज, सहस् तथा अमृतत्व की प्राप्ति हो।
Subject
सोमस्य त्विषिः ओज-सहस-अमृत