Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 1 / Mantra 30

31 Mantra
1/30
Devata- यज्ञो देवता Rishi- परमेष्ठी प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- निचृत् जगती, Swara- निषादः
Mantra with Swara
अदि॑त्यै॒ रास्ना॑सि॒ विष्णो॑र्वे॒ष्पोस्यू॒र्ज्जे त्वाऽद॑ब्धेन॒ त्वा॒ चक्षु॒षाव॑पश्यामि। अ॒ग्नेर्जि॒ह्वासि॑ सु॒हूर्दे॒वेभ्यो॒ धाम्ने॑ धाम्ने मे भव॒ यजु॑षे यजुषे॥३०॥

अदि॑त्यै। रास्ना॑। अ॒सि॒। विष्णोः॑। वे॒ष्पः। अ॒सि॒। ऊ॒र्ज्जे। त्वा॒। अद॑ब्धेन। त्वा॒। चक्षु॑षा। अव॑। प॒श्या॒मि॒। अ॒ग्नेः। जि॒ह्वा। अ॒सि॒। सु॒हूरिति सु॒ऽहूः॑। दे॒वेभ्यः॑। धाम्ने॑। धाम्न॒ऽइति॒ धाम्ने॑ धाम्ने। मे॒। भ॒व॒। यजु॑षे यजुष॒ऽइति॒ यजु॑षे यजुषे ॥३०॥

Mantra without Swara
अदित्यै रास्नासि विष्णोर्वेष्पोस्यूर्जे त्वादब्धेन त्वा चक्षुषावपश्यामि । अग्नेर्जिह्वासि सुहूर्देवेभ्यो धाम्नेधाम्ने मे भव यजुषेयजुषे ॥

अदित्यै। रास्ना। असि। विष्णोः। वेष्पः। असि। ऊर्ज्जे। त्वा। अदब्धेन। त्वा। चक्षुषा। अव। पश्यामि। अग्नेः। जिह्वा। असि। सुहूरिति सुऽहूः। देवेभ्यः। धाम्ने। धाम्नऽइति धाम्ने धाम्ने। मे। भव। यजुषे यजुषऽइति यजुषे यजुषे॥३०॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. हे उन्नतिशील जीव! ( अदित्यै ) = अदिति के लिए—अखण्डन की देवता के लिए तू ( रास्ना ) = मेखला ( असि ) = है। ‘अदिति’ अखण्डन की देवता है, किसी भी अङ्ग व शक्ति का खण्डित न होना, अर्थात् पूर्ण स्वस्थ होना। स्वास्थ्य के लिए मनुष्य का कटिबद्ध होना आवश्यक है। इस स्वास्थ्य पर ही धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष—ये सब पुरुषार्थ निर्भर हैं। यास्काचार्य ने ‘अदिति’ का अर्थ ‘अदीना देवमाता’ किया है, अतः तू अदीनता व दिव्य गुणों के निर्माण के लिए कटिबद्ध है। तू निश्चय करता है कि [ क ] मैं स्वस्थ बनूँगा, [ ख ] अदीन बनूँगा, [ ग ] अपने में दिव्य गुणों के निर्माण का प्रयत्न करूँगा। 

२. अब स्वस्थ, अदीन व दिव्य जीवनवाला बनकर तू ( विष्णवे ) = यज्ञ का [ यज्ञो वै विष्णुः ] ( वेष्पः ) = अपने में व्यापन करनेवाला ( असि ) = बना है। तूने अपने में यज्ञिय भावना का पोषण किया है। इस यज्ञ के द्वारा ही तो तुझे यज्ञात्मक प्रभु का उपासन करना है। 

३. ( ऊर्जे त्वा ) = मैं तुझे बल और शक्ति के लिए प्राप्त करता हूँ। 

४. ( अदब्धेन त्वा चक्षुषा अवपश्यामि ) = मैं अहिंसित आँख से तुझे देखता हूँ [ नक्ष् to look after ]। मैं निरन्तर तेरा ध्यान करता हूँ। वस्तुतः जो भी व्यक्ति अध्यात्म उन्नति के मार्ग पर चलता हुआ लोकहित में प्रवृत्त होता है, प्रभु उसका ध्यान करते हैं ‘तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमावहो हरिः’। 

५. तू ( अग्नेः ) = उस सम्पूर्ण प्रकाश के अधिपति प्रभु की ( जिह्वा असि ) = जिह्वा = वाणी बना है। प्रभु के सन्देश को सर्वत्र फैलाना तेरा ध्येय है। ( सु-हूः ) = इस कार्य में तू अपनी उत्तम आहुति देनेवाला हुआ है, अर्थात् तू बड़ी मधुरता से प्रजाओं में प्रभु के सन्देश को पहुँचाने के कार्य में लगा है।

यह प्रभु का सन्देशवाहक अब प्रभु से प्रार्थना करता है कि हे प्रभो! ( मे भव ) = आप मेरे हो जाइए, अर्थात् मैं सदा आपका बनकर रहूँ, मैं प्रकृति में न फँस जाऊँ। ( धाम्ने- धाम्ने ) = मैं एक-एक शक्ति को प्राप्त करने में समर्थ बनूँ। ( यजुषे-यजुषे ) = मैं प्रत्येक कर्म को यज्ञात्मक बना पाऊँ—मेरा प्रत्येक कर्म यज्ञरूप हो। मैं यज्ञ ही बन जाऊँ। ( देवेभ्यः ) = दिव्य गुणों की प्राप्ति के लिए मैं यही चाहता हूँ कि आप मेरे हों—मैं सदा आपका बना रहूँ। प्रभु को अपनाने से जहाँ हमारी शक्तियों में वृद्धि होती है वहाँ प्रत्येक कर्म यज्ञिय व पवित्र बनता है। प्रभु से दूर होने का परिणाम इससे विपरीत होता है।
Essence
भावार्थ — हम प्रयत्न करें कि प्रभु को अपना सकें। इससे हमारी शक्तियों की वृद्धि होगी और हमारा प्रत्येक कर्म यज्ञमय बनेगा। हम अन्याय से अर्थ-सञ्चय की ओर नहीं झुकेंगे।
Subject
मे भव—मेरे बनो