Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 1 / Mantra 1

31 Mantra
1/1
Devata- सविता देवता Rishi- परमेष्ठी प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- स्वराट्बृहती,ब्राह्मी उष्णिक्, Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
इ॒षे त्वो॒र्जे त्वा॑ वा॒यव॑ स्थ दे॒वो वः॑ सवि॒ता प्रार्प॑यतु॒ श्रेष्ठ॑तमाय॒ कर्म॑ण॒ऽआप्या॑यध्वमघ्न्या॒ऽइन्द्रा॑य भा॒गं प्र॒जाव॑तीरनमी॒वाऽअ॑य॒क्ष्मा मा व॑ स्ते॒नऽई॑शत॒ माघश॑ꣳसो ध्रु॒वाऽअ॒स्मिन् गोप॑तौ स्यात ब॒ह्वीर्यज॑मानस्य प॒शून् पा॑हि॥१॥

इ॒षे। त्वा॒। ऊ॒र्ज्जे। त्वा॒। वा॒यवः॑। स्थ॒। दे॒वः। वः॒। स॒वि॒ता। प्र। अ॒र्प॒य॒तु॒। श्रे॑ष्ठतमा॒येति॒ श्रे॑ष्ठऽतमाय। कर्म्म॑णे। आ। प्या॒य॒ध्व॒म्। अ॒घ्न्याः॒। इन्द्रा॑य। भा॒गं। प्र॒जाव॑ती॒रिति॑। प्र॒जाऽव॑तीः। अ॒न॒मी॒वाः। अ॒य॒क्ष्माः। मा। वः॒। स्ते॒नः। ई॒श॒त॒। मा अ॒घश॑ꣳसः॒ इत्य॒घऽश॑ꣳसः। ध्रुवाः। अस्मिन्। गोप॑ता॒विति॒ गोऽप॑तौ। स्या॒त॒। ब॒ह्वीः। यज॑मानस्य। प॒शून्। पा॒हि॒ ॥१॥

Mantra without Swara
इषे त्वोर्जे त्वा वायव स्थ देवो वः सविता प्रार्पयतु श्रेष्ठतमाय कर्मण आप्यायध्वमघ्न्या इन्द्राय भागम्प्रजावतीरनमीवाऽअयक्ष्मा मा व स्तेनऽईशत माघशँसो धु्रवाऽअस्मिन्गोपतौ स्यात बह्वीः यजमानस्य पशून्पाहि ॥

इषे। त्वा। ऊर्ज्जे। त्वा। वायवः। स्थ। देवः। वः। सविता। प्र। अर्पयतु। श्रेष्ठतमायेति श्रेष्ठऽतमाय। कर्म्मणे। आ। प्यायध्वम्। अघ्न्याः। इन्द्राय। भागं। प्रजावतीरिति। प्रजाऽवतीः। अनमीवाः। अयक्ष्माः। मा। वः। स्तेनः। ईशत। मा अघशꣳसः इत्यघऽशꣳसः। ध्रुवाः। अस्मिन्। गोपताविति गोऽपतौ। स्यात। बह्वीः। यजमानस्य। पशून्। पाहि॥१॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
जीव प्रभु से प्रार्थना करता है कि मैं (त्वा)=आपके चरणों में उपस्थित हुआ हूँ, (इषे)=प्रेरणा प्राप्त करने के लिए [इष प्रेरणे, Impel, Urge, Incite, Animate], न केवल प्रेरणा प्राप्त करने के लिए, अपितु (त्वा)=आपके चरणों में आया हूँ (ऊर्जे)=शक्ति और उत्साह के लिए। आप मुझे उत्तम प्रेरणा प्राप्त कराइए, उस प्रेरित लक्ष्य तक पहुँचने के लिए शक्ति दीजिए और शक्ति के साथ उत्साह भी दीजिए कि मैं उस लक्ष्य तक पहुँचने में कभी ढीला न पड़ जाऊँ। ‘प्रेरणा, शक्ति व उत्साह’—तीनों से युक्त जीवन ही तो वास्तविक जीवन है। हे प्रभो! मुझे तो आप बस, यही जीवन प्राप्त करने के योग्य कीजिए।

इस उपासक जीव को प्रभु प्रेरणा देना आरम्भ करते हैं और कहते हैं कि—

1. (वायवः स्थ)=[वा गतौ] हे जीवो! तुम गतिशील हो—अकर्मण्यता तुम्हें छू भी नहीं गई। ‘आत्मा’ शब्द का अर्थ ही सतत् गतिशील है। अकर्मण्यता यदि जीर्ण और शीर्ण कर देती है तो क्रियाशीलता विकास व प्रादुर्भाव का कारण बनती है। वस्तुतः क्रियाशीलता ही जीवन है।
2. (सविता देवः वः श्रेष्ठतमाय कर्मणे प्रार्पयतु)=बस, तुम कुछ ऐसी अनुकूलता पैदा करो कि सुप्रेरक विद्वान् तुम्हें श्रेष्ठतम कर्म में प्रेरित करें। [प्रार्थनायां लोट्]।
3. (आप्यायध्वम्)=इस प्रकार तुम दिन प्रतिदिन बढ़ो। बढ़ने का मार्ग यही है कि मनुष्य क्रियाशील हो और फिर वह क्रियाशीलता श्रेष्ठतम कर्मों की ओर झुकाववाली हो।
4. (अघ्न्याः) [अ+हन्+य]=तुम हिंसा न करनेवालों में उत्तम बनना। तुम्हारा प्रत्येक कार्य ऐसा हो जो निर्माण व हित के उद्देश्य से चल रहा हो, किसी भी कार्य में ध्वंस व विनाश न हो।
5. (इन्द्राय भागम्)=तुम परमैश्वर्यशाली मुझ प्रभु के लिए सेवनीय अंशों को ही अपनानेवाले बनो [भज सेवायाम्]। तुममें प्रकृति का आधिक्य न होकर प्रभु का आधिक्य हो, अर्थात् प्रेय के पीछे न मरकर तुम श्रेय को अपनानेवाले बनो। अपने जीवनों को ऐसा बनाकर तुम—
6. (प्रजावतीः)=उत्तम सन्तानवाले बनो। तुम्हारे जीवन में यह एक महती असफलता होगी यदि तुम्हारी सन्तान ठीक न हुई।
7. (अनमीवाः)=इस जीवनयात्रा में ऐसे ढंग से चलना कि तुम रोगाक्रान्त न हो जाओ। तुम्हारा यह शरीररूप रथ टूट न जाए। ऐसा हुआ तो यात्रा कैसे पूरी होगी? पाँचवें संकेत ‘इन्द्राय भागम्’ का ध्यान करोगे तो नीरोग रहोगे ही। प्रभुभक्त अस्वस्थ नहीं होता, प्रकृति में आसक्त ही रोगी हुआ करता है।
8. (अयक्ष्माः)=तुम्हें यक्ष्मा न घेर ले, तुम इस राजरोग के चक्कर में न आ जाओ। प्रकृति का ठीक प्रयोग करने से रोग आएँगे ही क्यों?
9. (मा वः स्तेनः ईशत)=स्तेन तुम्हारा ईश न बन जाए। बिना श्रम के धन-प्राप्ति की इच्छा ही ‘स्तेन’ है। यह Horse races, lotteries, तथा विविध प्रकार के सट्टों [speculations] के रूप में प्रकट होती है। इससे सदा दूर रहना। यह मनुष्य को कामचोर बनाकर आरामपसन्द बना देती है और इस प्रकार बीमारियों व व्यसनों की शिकार कर देती है।
10. (मा अघशंसः ईशत)=पाप को अच्छे रूप में चित्रित करनेवाला कोई व्यक्ति तुम्हारे विचारों पर शासन करनेवाला न बन जाए।
11. (ध्रुवा अस्मिन् गोपतौ स्यात)=इस गोपति में तुम ध्रुव होकर रहना। ‘गावः इन्द्रियाणि’—गौवें इन्द्रियाँ हैं, इनका रक्षक प्रभु है। गौ का अर्थ वेदवाणी करें तो उन वेदवाणियों का पति प्रभु है ही। इस प्रभु में तुम ध्रुव होकर रहना। जो प्रभु से दूर हुआ वही इस द्वन्द्वात्मक जगत् [ दुनिया ] की चक्की के दो पाटों में आकर पिस गया। प्रभु ही विश्वचक्र के केन्द्र की कीली हैं—उन्हीं में तू स्थिरता से निवास करना।
12. (बह्वीः)=बहुत होना। संसार में आत्मकेन्द्रित-सा होकर स्वार्थरत व्यक्ति न बन जाना। अधिक-से-अधिक प्राणियों से अपना तादात्म्य स्थापित करने का प्रयत्न करना, औरों से ‘अयुत’ होना। ‘एकोऽ हं बहु स्याम’ मैं एक से बहुत हो जाऊँ, इस बात का ध्यान रखना, औरों के दुःख को भी अनुभव करना।
13. और अन्त में (यजमानस्य)=इस सृष्टि-यज्ञ को चलानेवाले मुझ प्रभु के (पशून्) [कामः पशुः, क्रोधः पशुः]=काम-क्रोधादि पशुओं को (पाहि)=बड़ा सुरक्षित रखना। ग्लुकोज को बड़ी सावधानी से रखने की आवश्यकता नहीं होती, परन्तु आर्सनिक को तो अलमारी में बन्द रखना आवश्यक है ही। चिड़ियाघर में मृग को बहुत बन्धन में रखना आवश्यक नहीं होता, परन्तु शेर को दृढ़ पिंजरे में रखना कितना आवश्यक है? इसी प्रकार इन काम- क्रोध को भी रखना तो है, परन्तु पूर्ण नियमन में। प्रार्थना भी तो ‘नियंसत्’ है, न कि ‘नष्ट कर दे’ यह है। काम संसार का मूल है—प्रजननात्मक काम पवित्र है, आवश्यक है, परन्तु यही अनियन्त्रित होकर शक्ति का विनाश करके क्षयकारक हो जाता है। क्रोध भी आवश्यक है, परन्तु स्वयं अनियन्त्रित होने पर अनर्थों का मूल हो जाता है।

जीव ने प्रभु से ‘प्ररेणा’ देने की याचना की थी—प्रभु ने इन तेरह वाक्यों में जीव को प्रेरणा दी है। ये तेरह वाक्य ही ‘सत्याकारास्त्रयोदश’—सत्य के तेरह स्वरूप हैं। इस प्रेरणा को अपनानेवाला जीव उन्नति-पथ पर आगे बढ़ता हुआ एक दिन ‘परमेष्ठी’—परम स्थान में स्थित होता है। यह प्रजा की रक्षा करने से प्रजापति कहलता है। इस प्रकार यह इस मन्त्र का ऋषि ‘परमेष्ठी प्रजापतिः’ होता है।
 
Essence
भावार्थ—जीव प्रभु से प्रेरणा माँगता है। प्रभु उसे तेरह वाक्यों में बड़ी सुन्दर प्रेरणा देते हैं। इस प्रेरणा को अपनाने से ही जीव ‘परमेष्ठी’ बन सकता है।
 
Subject
प्रभु की प्रेरणा का स्वरूप