Yajurveda Bhashya (Swami Dayanand Saraswati)

Yajurveda Adhyay 35 / Mantra 2

22 Mantra
35/2
Devata- सविता देवता Rishi- आदित्या देवा ऋषयः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
स॒वि॒ता ते॒ शरी॑रेभ्यः पृथि॒व्यां लो॒कमि॑च्छतु।तस्मै॑ युज्यन्तामु॒स्रियाः॑॥२॥

स॒वि॒ता। ते॒ शरी॑रेभ्यः। पृ॒थि॒व्याम्। लो॒कम्। इ॒च्छ॒तु॒ ॥ तस्मै॑। यु॒ज्य॒न्ता॒म्। उ॒स्रियाः॑ ॥२ ॥

Mantra without Swara
सविता ते शरीरेभ्यः पृथिव्याँल्लोकमिच्छतु । तस्मै युज्यन्तामुस्रियाः ॥

सविता। ते शरीरेभ्यः। पृथिव्याम्। लोकम्। इच्छतु॥ तस्मै। युज्यन्ताम्। उस्रियाः॥२॥

Yajurveda Bhashya (Swami Dayanand Saraswati)

हिन्दी
Yajurveda Bhashya (Swami Dayanand Saraswati) - हिन्दी
Meaning
हे जीव! (सविता) परमात्मा जिस (ते) तेरे (शरीरेभ्यः) जन्म-जन्मान्तरों के शरीरों के लिये (पृथिव्याम्) अन्तरिक्ष वा भूमि में (लोकम्) कर्मों के अनुकूल सुख-दुःख के साधन प्रापक स्थान को (इच्छतु) चाहे (तस्मै) उस तेरे लिये (उस्रियाः) प्रकाशरूप किरण (युज्यन्ताम्) अर्थात् उपयोगी हों॥२॥
Essence
हे जीवो! जो जगदीश्वर तुम्हारे लिये सुख चाहता है और किरणों के द्वारा लोक-लोकान्तर को पहुंचाता है, वही तुम लोगों को न्यायकारी मानना चाहिये॥२॥
Subject
फिर ईश्वर के कर्त्तव्य विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥