Yajurveda Bhashya (Swami Dayanand Saraswati)

Yajurveda Adhyay 34 / Mantra 43

58 Mantra
34/43
Devata- विष्णुर्देवता Rishi- मेधातिथिर्ऋषिः Chhand- निचृद् गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
त्रीणि॑ प॒दा विच॑क्रमे॒ विष्णु॑र्गो॒पाऽअदा॑भ्यः।अतो॒ धर्मा॑णि धा॒रय॑न्॥४३॥

त्रीणि॑। प॒दा। वि। च॒क्र॒मे॒। विष्णुः॑। गो॒पाः। अदा॑भ्यः ॥ अतः॑। धर्मा॑णि। धा॒रय॑न् ॥४३ ॥

Mantra without Swara
त्रीणि पदा वि चक्रमे विष्णुर्गोपाऽअदाभ्यः । अतो धर्माणि धारयन् ॥

त्रीणि। पदा। वि। चक्रमे। विष्णुः। गोपाः। अदाभ्यः॥ अतः। धर्माणि। धारयन॥४३॥

Yajurveda Bhashya (Swami Dayanand Saraswati)

हिन्दी
Yajurveda Bhashya (Swami Dayanand Saraswati) - हिन्दी
Meaning
हे मनुष्यो! जो (अदाभ्यः) अहिंसा धर्मवाला होने से दयालु (गोपाः) रक्षक (विष्णुः) चराचर जगत् में व्याप्त परमेश्वर (धर्माणि) पुण्यरूप कर्मों का धारक पृथिव्यादि को (धारयन्) धारण करता हुआ (अतः) इस कारण से (त्रीणि) तीन (पदा) जानने वा प्राप्त होने योग्य कारण, सूक्ष्म और स्थूलरूप जगत् का (वि, चक्रमे) आक्रमण करता है, वही हम लोगों का पूजनीय है॥४३॥
Essence
हे मनुष्यो! जिस परमेश्वर ने भूमि, अन्तरिक्ष और सूर्य्यरूप करके तीन प्रकार के जगत् को बनाया, सबको धारण किया और रक्षित किया है, वही उपासना के योग्य इष्टदेव है॥४३॥
Subject
अब ईश्वर के विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥