Yajurveda Bhashya (Swami Dayanand Saraswati)

Yajurveda Adhyay 33 / Mantra 76

97 Mantra
33/76
Devata- इन्द्राग्नी देवते Rishi- वसिष्ठ ऋषिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
उ॒क्थेभि॑र्वृत्र॒हन्त॑मा॒ या म॑न्दा॒ना चि॒दा गि॒रा।आ॒ङ्गू॒षैरा॒विवा॑सतः॥७६॥

उ॒क्थेभिः॑। वृ॒त्र॒हन्त॒मेति॑ वृत्र॒हन्ऽत॑मा। या। मन्दा॒ना। चि॒त्। आ। गि॒रा ॥ आ॒ङ्गूषैः। आ॒विवा॑सत॒ इत्या॒विवा॑सतः ॥७६ ॥

Mantra without Swara
उक्थेभिर्वृत्रहन्तमा या मन्दाना चिदा गिरा । आङ्गूषैराविवासतः ॥

उक्थेभिः। वृत्रहन्तमेति वृत्रहन्ऽतमा। या। मन्दाना। चित्। आ। गिरा॥ आङ्गूषैः। आविवासत इत्याविवासतः॥७६॥

Yajurveda Bhashya (Swami Dayanand Saraswati)

हिन्दी
Yajurveda Bhashya (Swami Dayanand Saraswati) - हिन्दी
Meaning
(या) जो (मन्दाना) आनन्द देनेवाले (वृत्रहन्तमा) धर्म का निरोध करनेहारे पापियों के नाशक सभा सेनापति के (चित्) समान (गिरा) वाणी (आङ्गूषैः) अच्छे घोष और (उक्थेभिः) प्रशंसा योग्य स्तुतियों के साधक वेद के भागरूप मन्त्रों से शिल्प विज्ञान का (आविवासतः) अच्छे प्रकार सेवन करते हैं, उन अध्यापक उपदेशकों की मनुष्यों को (आ) अच्छे प्रकार सेवा करनी चाहिये॥७६॥
Essence
जो मनुष्य सभा सेनाध्यक्ष के तुल्य विद्यादि कार्य्यों के साधक सुन्दर उपदेशों से सबको विद्वान् करते हुए प्रवृत्त हों, वे ही सबको सत्कार करने योग्य हों॥७६॥
Subject
कैसे मनुष्य सत्कार के योग्य हों, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥