Yajurveda Bhashya (Swami Dayanand Saraswati)

Yajurveda Adhyay 33 / Mantra 61

97 Mantra
33/61
Devata- इन्द्राग्नी देवते Rishi- भरद्वाज ऋषिः Chhand- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
उ॒ग्रा वि॑घ॒निना॒ मृध॑ऽइन्द्रा॒ग्नी ह॑वामहे। ता नो॑ मृडातऽई॒दृशे॑॥६१॥

उ॒ग्रा। विघ॒निनेति॑ विऽघ॒निना॑। मृधः॑। इ॒न्द्रा॒ग्नीऽइती॑न्द्रा॒ग्नी। ह॒वा॒म॒हे॒ ॥ ता। नः॒। मृ॒डा॒तः॒। ई॒दृशे॑ ॥६१ ॥

Mantra without Swara
उग्रा विघनिना मृधऽइन्द्राग्नी हवामहे । ता नो मृडात ईदृशे ॥

उग्रा। विघनिनेति विऽघनिना। मृधः। इन्द्राग्नीऽइतीन्द्राग्नी। हवामहे॥ ता। नः। मृडातः। ईदृशे॥६१॥

Yajurveda Bhashya (Swami Dayanand Saraswati)

हिन्दी
Yajurveda Bhashya (Swami Dayanand Saraswati) - हिन्दी
Meaning
हे मनुष्यो! हम जिन (उग्रा) अधिक बली तेजस्वी स्वभाववाले (मृधः) और हिंसकों को (विघनिना) विशेष कर मारनेहारे (इन्द्राग्नी) सभा-सेनापति को (हवामहे) बुलाते हैं (ता) वे (ईदृशे) इस प्रकार के संग्रामादि व्यवहार में (नः) हम लोगों को (मृडातः) सुखी करते हैं॥६१॥
Essence
जो सभा और सेना के अध्यक्ष पक्षपात को छोड़ बल को बढ़ा के शत्रुओं को जीतते हैं, वे सबको सुख देनेवाले होते हैं॥६१॥
Subject
अब सभा-सेनापति क्या करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥