Yajurveda Bhashya (Swami Dayanand Saraswati)

Yajurveda Adhyay 33 / Mantra 4

97 Mantra
33/4
Devata- अग्निर्देवता Rishi- विश्वरूप ऋषिः Chhand- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
यु॒क्ष्वा हि दे॑व॒हूत॑माँ॒२ऽअश्वाँ॑२ऽअग्ने र॒थीरि॑व।नि होता॑ पू॒र्व्यः स॑दः॥४॥

यु॒क्ष्व। हि। दे॒व॒हूत॑मा॒निति॑ देव॒ऽहूत॑मान्। अश्वा॑न्। अ॒ग्ने॒। र॒थीरि॒वेति॑ र॒थीःऽइ॑व ॥ नि। होता॑। पू॒र्व्यः। स॒दः॒ ॥४ ॥

Mantra without Swara
युक्ष्वा हि देवहूतमाँऽअश्वाँ अग्ने रथीरिव । नि होता पूर्व्यः सदः ॥

युक्ष्व। हि। देवहूतमानिति देवऽहूतमान्। अश्वान्। अग्ने। रथीरिवेति रथीःऽइव॥ नि। होता। पूर्व्यः। सदः॥४॥

Yajurveda Bhashya (Swami Dayanand Saraswati)

हिन्दी
Yajurveda Bhashya (Swami Dayanand Saraswati) - हिन्दी
Meaning
हे (अग्ने) विद्वन्! आप (रथीरिव) सारथि के समान (देवहूतमान्) विद्वानों से अत्यन्त स्तुति किये हुए (अश्वान्) शीघ्रगामी अग्नि आदि वा घोड़ों को (युक्ष्व) युक्त कीजिये (पूर्व्यः) पूर्वज विद्वानों से विद्या को प्राप्त (होता) ग्रहण करते हुए (हि) निश्चय कर (नि, सदः) स्थिर हूजिये॥४॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे उत्तम शिक्षित सारथि घोड़ों से अनेक कार्य्यों को सिद्ध करता है, वैसे विद्वान् जन अग्नि आदि से अनेक कार्यों को सिद्ध करें॥४॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥