Yajurveda Bhashya (Swami Dayanand Saraswati)

Yajurveda Adhyay 27 / Mantra 31

45 Mantra
27/31
Devata- वायुर्देवता Rishi- अजमीढ ऋषिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
वा॒युर॑ग्रे॒गा य॑ज्ञ॒प्रीः सा॒कं ग॒न्मन॑सा य॒ज्ञम्।शि॒वो नि॒युद्भिः॑ शि॒वाभिः॑॥३१॥

वा॒युः। अ॒ग्रे॒गाऽइत्य॑ग्रे॒ऽगाः। य॒ज्ञ॒प्रीरिति॑ यज्ञ॒ऽप्रीः। सा॒कम्। ग॒न्। मन॑सा। य॒ज्ञम्। शि॒वः। नि॒युद्भि॒रिति॑ नि॒युत्ऽभिः॑। शि॒वाभिः॑ ॥३१ ॥

Mantra without Swara
वायुरग्रेगा यज्ञप्रीः साकङ्गन्मनसा यज्ञम् । शिवो नियुद्भिः शिवाभिः ॥

वायुः। अग्रेगाऽइत्यग्रेऽगाः। यज्ञप्रीरिति यज्ञऽप्रीः। साकम्। गन्। मनसा। यज्ञम्। शिवः। नियुद्भिरिति नियुत्ऽभिः। शिवाभिः॥३१॥

Yajurveda Bhashya (Swami Dayanand Saraswati)

हिन्दी
Yajurveda Bhashya (Swami Dayanand Saraswati) - हिन्दी
Meaning
हे विद्वन्! जैसे (वायुः) पवन (नियुद्भिः) निश्चित (शिवाभिः) मङ्गलकारक क्रियाओं से (यज्ञम्) यज्ञ को (गन्) प्राप्त होता है, वैसे (शिवः) मङ्गलस्वरूप (अग्रेगाः) अग्रगामी (यज्ञप्रीः) यज्ञ को पूर्ण करने हारे हुए आप (मनसा) मन की वृत्ति के (साकम्) साथ यज्ञ को प्राप्त हूजिये॥३१॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। इस मन्त्र में (आ, याहि) इस पद की अनुवृत्ति पूर्व मन्त्र से आती है। जैसे वायु अनेक पदार्थों के साथ जाता-आता है, वैसे विद्वान् लोग धर्मयुक्त कर्मों को विज्ञान से प्राप्त होवें॥३१॥
Subject
अब विद्वानों को क्या करना चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥