Yajurveda Bhashya (Swami Dayanand Saraswati)

Yajurveda Adhyay 22 / Mantra 23

34 Mantra
22/23
Devata- प्राणादयो देवताः Rishi- प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- स्वराडनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
प्रा॒णाय॒ स्वाहा॑ऽपा॒नाय॒ स्वाहा॑ व्या॒नाय॒ स्वाहा॒ चक्षु॑षे॒ स्वाहा॒ श्रोत्रा॑य॒ स्वाहा॑ वा॒चे स्वाहा॒ मन॑से॒ स्वाहा॑॥२३॥

प्रा॒णाय॑। स्वाहा॑। अ॒पा॒नाय॑। स्वाहा॑। व्या॒नायेति॑ विऽआ॒नाय॑। स्वाहा॑। चक्षु॑षे। स्वाहा॑। श्रोत्रा॑य। स्वाहा॑। वा॒चे। स्वाहा॑। मन॑से। स्वाहा॑ ॥२३ ॥

Mantra without Swara
प्राणाय स्वाहापानाय स्वाहा व्यानाय स्वाहा चक्षुषे स्वाहा श्रोत्राय स्वाहा वाचे स्वाहा मनसे स्वाहा ॥

प्राणाय। स्वाहा। अपानाय। स्वाहा। व्यानायेति विऽआनाय। स्वाहा। चक्षुषे। स्वाहा। श्रोत्राय। स्वाहा। वाचे। स्वाहा। मनसे। स्वाहा॥२३॥

Yajurveda Bhashya (Swami Dayanand Saraswati)

हिन्दी
Yajurveda Bhashya (Swami Dayanand Saraswati) - हिन्दी
Meaning
जिन मनुष्यों ने (प्राणाय) जो पवन भीतर से बाहर निकलता है, उसके लिये (स्वाहा) योगविद्यायुक्त क्रिया (अपानाय) जो बाहर से भीतर को जाता है, उस पवन के लिये (स्वाहा) वैद्यकविद्यायुक्तक्रिया (व्यानाय) जो विविध प्रकार के अङ्गों में व्याप्त होता है, उस पवन के लिये (स्वाहा) वैद्यकविद्यायुक्त वाणी (चक्षुषे) जिससे प्राणी देखता है, उस नेत्र इन्द्रिय के लिये (स्वाहा) प्रत्यक्षप्रमाणयुक्त वाणी (श्रोत्राय) जिस से सुनता है, उस कर्णेन्द्रिय के लिये (स्वाहा) शास्त्रज्ञ विद्वान् के उपदेशयुक्त वाणी (वाचे) जिससे बोलता है, उस वाणी के लिये (स्वाहा) सत्यभाषण आदि व्यवहारों से युक्त बोलचाल तथा (मनसे) विचार का निमित्त संकल्प और विकल्पवान् मन के लिये (स्वाहा) विचार से भरी हुई वाणी प्रयोग की जाती अर्थात् भलीभांति उच्चारण की जाती है, वे विद्वान् होते हैं॥२३॥
Essence
जो मनुष्य यज्ञ से शुद्ध किये जल, औषधि, पवन, अन्न, पत्र, पुष्प, फल, रस, कन्द अर्थात् अरबी, आलू, कसेरू, रतालू और शकरकन्द आदि पदार्थों का भोजन करते हैं, वे नीरोग होकर बुद्धि, बल, आरोग्यपन और आयुर्दा वाले होते हैं॥२३॥
Subject
फिर किसलिये होम का विधान करना चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है।