Yajurveda Bhashya (Swami Dayanand Saraswati)

Yajurveda Adhyay 19 / Mantra 22

95 Mantra
19/22
Devata- यज्ञो देवता Rishi- हैमवर्चिर्ऋषिः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
धा॒नाना॑ रू॒पं कुव॑लं परीवा॒पस्य॑ गो॒धूमाः॑। सक्तू॑ना रू॒पं बदर॑मुप॒वाकाः॑। कर॒म्भस्य॑॥२२॥

धा॒नाना॑म्। रू॒पम्। कुव॑लम्। प॒री॒वा॒पस्य॑। प॒री॒वा॒पस्येति॑ परिऽवा॒पस्य॑। गो॒धूमाः॑। सक्तू॑नाम्। रू॒पम्। बद॑रम्। उ॒प॒वाका॒ इत्यु॑प॒ऽवाकाः॑। क॒र॒म्भस्य॑ ॥२२ ॥

Mantra without Swara
धानानाँ रूपङ्कुवलम्परीवापस्य गोधूमाः । सक्तूनाँ रूपम्बदरमुपवाकाः करम्भस्य ॥

धानानाम्। रूपम्। कुवलम्। परीवापस्य। परीवापस्येति परिऽवापस्य। गोधूमाः। सक्तूनाम्। रूपम्। बदरम्। उपवाका इत्युपऽवाकाः। करम्भस्य॥२२॥

Yajurveda Bhashya (Swami Dayanand Saraswati)

हिन्दी
Yajurveda Bhashya (Swami Dayanand Saraswati) - हिन्दी
Meaning
हे मनुष्यो! तुम लोग (धानानाम्) भुंजे हुए जौ आदि अन्नों का (कुवलम्) कोमल बेर सा रूप (परीवापस्य) पिसान आदि का (गोधूमाः) गेहूं (रूपम्) रूप (सक्तूनाम्) सत्तुओं का (बदरम्) बेरफल के समान रूप (करम्भस्य) दही मिले सत्तू का (उपवाकाः) समीप प्राप्त जौ (रूपम्) रूप है, ऐसा जाना करो॥२२॥
Essence
जो मनुष्य सब अन्नों का सुन्दर रूप करके भोजन करते और कराते हैं, वे आरोग्य को प्राप्त होते हैं॥२२॥
Subject
कैसे मनुष्य नीरोग होते हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥